समाज की पाँचों स्थितियों में लक्ष्य समान है। लक्ष्य विहीन मानव नहीं है।
लक्ष्य जब आकाँक्षा व आशावश आवश्यकता या अनिवार्यता के रूप में परिवर्तित (तीव्र इच्छा) होगा, तब यही कार्यक्रम के लिए बाध्यता होगी, क्योंकि लक्ष्य विहीन कार्यक्रम नहीं है।
निश्चित लक्ष्य उचित कार्यक्रम को पहचानने एवं सम्पन्न करने में मानव समर्थ है।
औचित्यता मानवीयता पूर्ण पद्धति से सिद्ध होती है, जो स्पष्ट दर्शन क्षमता पर आधारित है। यही विश्लेषण है।
अतिमानवीयता या अमानवीयता की अपेक्षा में ही मानवीयता का निर्धारण होता है। साथ ही इसी सीमा में विश्लेषण भी पूर्ण होता है।
मानव के चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता ही अभयता, समाधान एवं समृद्धि है।