त्रुटि एवं अपराध मानव की वांछित प्रस्तुति नहीं है। यह प्रस्तुति तब तक रहेगी जब तक अध्ययन पूर्ण न हो जाय, प्रत्येक मानव में अध्ययन प्रवृत्ति जन्म से ही पाई जाती है। इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि उत्पादन और व्यवहारिक अध्ययन को संतुलित रूप में संपन्न करना अनिवार्य है।
न्यायपूर्ण व्यवहार व शिक्षा मानवीयता में प्रत्यक्ष है। गुणात्मक स्थितिवत्ता की उपेक्षा ही अज्ञान, अभाव, असमर्थता एवं अक्षमता है। अज्ञानी को ज्ञानी में, अभाव को भाव में, असमर्थ को समर्थ में, अक्षम को सक्षम में परिवर्तित, परिमार्जित करने के लिए शिक्षा एवं व्यवस्था है।