आचरण विहीन इकाई नहीं है। अस्तु, मानवीयतापूर्ण आचरण व्यक्ति में; सहयोग-सहकार्य योग्य क्षमता परिवार में; प्रोत्साहन योग्य प्रचार, प्रदर्शन एवं प्रकाशन समाज में; उसका संरक्षण एवं संवर्धन योग्य विधि एवं व्यवस्था राष्ट्र में; उसके अनुकूल परिस्थितियाँ अन्तर्राष्ट्र में प्राप्त कर लेना ही पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता का सूत्र है।
प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्थापित संबंध समान हैं। संबंधों में निहित मूल्य नित्य हैं। किसी का सान्निध्य दूर होने मात्र से, उस संबंध में निहित मूल्य का परिवर्तन नहीं है, इसी प्रकार वियोग में भी। वियोग शरीर का है न कि मूल्यों का, जो प्रत्यक्ष है। जैसे माता-पिता से वियोग। जीवन कालीन वियोग में भी पिता के प्रति जो मूल्य है, उसका परिवर्तन नहीं है।
प्रत्येक परस्परता में दायित्व (बाध्यता सहित देय सीमा) समाया हुआ है। यही स्थापित मूल्यों में वस्तु व सेवा को अर्पित करता है। सभी अर्पण, मूल्यों के प्रति समर्पण है। यही अर्पंण प्रक्रिया ही कर्त्तव्य है। व्यवहारपूर्वक यह प्रमाणित होता है कि ऐसा कोई संबंध नहीं है, जिसमें मूल्य न हो और जिसके प्रति दायित्व व कर्त्तव्य न हो।
संबंध सीमा ही परिवार एवं समाज है। जन्म, जीवन, व्यवहार विशिष्ट, शिष्ट, नीति एवं उत्पादन भेद से संबंध प्रसिद्ध हैं।
1. शरीर संबंध = माता-पिता एवं भाई-बहन, पति-पत्नि, पुत्र-पुत्री
2. जीवन-जीवन संबंध = गुरु-शिष्य, जागृत सभी संबंध
3. शिष्ट-शिष्ट संबंध = मित्र, साथी, सहयोगी
4. नीति-नीति संबंध = विधि, व्यवस्था, संस्कृति एवं सभ्यता
5. उत्पादन-उत्पादन संबंध = क्षमता, अवसर, साधन एवं वितरण
संबंधों में निहित मूल्यवत्तावश ही उसकी अक्षुण्णता पाई जाती है। यही अखण्ड समाज की अक्षुण्णता भी है।
मूल्यों की स्थिरता ही अखण्डता एवं अक्षुण्णता है, जो नियति क्रम में पाये जाने वाले तथ्य हैं। समाज की पाँचों स्थितियाँ परस्पर पूरक हैं, जिसकी एकसूत्रता ही अखण्डता है। अन्तर्राष्ट्र में “नीतित्रय” का संतुलन; राष्ट्र में मानवीयता के संरक्षण एवं संवर्धन योग्य विधि व्यवस्था एवं शिक्षा-प्रणाली-पद्धति; सामाजिकता में मानवीयता का प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन एवं