प्रोत्साहन; परिवार में मानवीयता के प्रति समर्पण, विश्वास एवं निष्ठा; व्यक्ति में मानवीयता पूर्ण आचरण, व्यवहार, अभ्यास, अनुभव, विचार तथा आवश्यकता से अधिक उत्पादन ही लोक मंगल कार्यक्रम है। यही चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता का सूत्र है।
प्रत्येक मानव में सीमित शक्ति, निश्चित दायित्व, कर्त्तव्य एवं स्थापित संबंध पाये जाते हैं, जिनकी एकसूत्रता “नियम त्रय” एवं मानवीयता पूर्ण पद्धति से प्रमाणित होती है। यही गुणात्मक परिवर्तन का औचित्य और मानवीय आचार संहिता है।
मानव की मूल शक्ति निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य है, यही मूल पूंजी है। यही मानव का मूल मूर्त्त रूप भी है जो क्षमता, उत्पादन और व्यवहार के रूप में प्रकट होता है। यही प्रकटन व्यवहारात्मक जनवाद एवं समाधानात्मक भौतिकवाद को स्पष्ट एवं चरितार्थ करता है।
प्रत्येक व्यक्ति, परिवार व वर्ग स्वत्व और स्वतंत्रता चाहता है।
स्वाधीनता सहित ही स्वत्व है। स्वविचार, इच्छा, संकल्प, आशानुरूप चालन, संचालन एवं नियोजन क्रिया ही स्वाधीनता है, जो प्रत्यक्ष है। यही सार्वभौमता विधि से सफल है।
स्वयं का प्रत्यक्ष रूप ही स्थिति है, जो अनुभव है। ऐसी क्षमता के अधीन जो कुछ भी है, वही स्वाधीनता है। स्व-बौद्धिकता के अधीन = स्वाधीनता।
स्वयं से वियोग न होना ही स्वत्व है।
भ्रमवश सम्पतिकरण ही समाज को सामाजिकता से वंचित करता है।
“मानव का स्वत्व केवल निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही है।” साथ ही उसके नियोजन से उत्पन्न उत्पादनों पर भी प्रत्यक्ष रूप में स्वत्व होता है, जो सामाजिक है। भ्रमवश सम्पतिकरण ही समाज का सामाजिकता से वंचित कर देता है, क्योंकि संग्रह प्रवृत्ति ही क्लेश परिपाकात्मक है, जो प्रसिद्ध है। मानव जीवन असंग्रह (समृद्धि), स्नेह, विद्या, सरलता एवं अभयात्मक मूल प्रवृत्तियों पर ही हर्ष का अनुभव करता है। संग्रह, द्वेष, अविद्या, अभिमान एवं भयात्मक प्रवृत्तियों पर आधारित संपूर्ण व्यवहार, उत्पादन एवं आचरण स्वयं में, से, के लिए क्लेश सहित है।
“जो जिसके पास है, उसी का वह बंटन करता है।”
इसलिए संपूर्ण उपार्जन मानवीयता की सीमा में उपयोगितापूर्ण उपयोगवादी प्रक्रिया, व्यवहार एवं आचरण ही सामाजिक तथा अमानवीयता की सीमा में संग्रह सहित, उपभोगवादी विचार प्रक्रिया, व्यवहार एवं आचरण ही असामाजिक सिद्ध हुआ है।