मानव का अधिकार भौतिक (उत्पादन व व्यवस्था) की सीमा में; अधिकार एवं स्वतंत्रता बौद्धिक (आचरण एवं स्वतंत्रता) की सीमा में; अधिकार स्वतंत्रता एवं स्वत्व अध्यात्म (अनुभव) में चरितार्थ हुआ है। यही व्यवहारात्मक जनवाद, समाधानात्मक भौतिकवाद, अनुभवात्मक अध्यात्मवाद है, जो धर्म नीति एवं राज्य नीति को स्पष्ट करता है।
जो स्वयं के अधीन में हो जिससे स्व-विचार, इच्छा, संकल्प एवं आशानुरूप नियोजनपूर्वक प्रमाण सिद्ध हो, यही स्वत्व का प्रत्यक्ष रूप है। मानव में पाये जाने वाले मूल तत्व ही निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य है, जिनका वियोग संभव नहीं है। इसलिए यह मानव का स्वत्व सिद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त भी वस्तु का संग्रह, स्थान का सम्पतिकरण (स्वामित्व) पूर्वक स्वत्व को पाने का प्रयास भ्रमित मानव ने किया है, जिसमें वह सफल नहीं हुआ। साथ ही उनका सफल होना संभव भी नहीं है। क्योंकि -
1. मानव का भौतिक शरीर अमर नहीं है।
2. मानव के द्वारा किया गया संग्रह व सम्पत्तिकरण स्वयं क्षरणशील है।
3. स्थान और वस्तुओं का संपत्तिकरण अस्थायी है।
इसलिए मानव, मानव के साथ व्यवहार, मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ उत्पादन, अधिक विकसित के साथ गौरव व कृतज्ञ होने एवं सत्ता में अनुभव के लिए प्रवृत्त है।
सत्ता में अनुभव करने के लिए अवसर सबके पास समान है, किन्तु पात्रता व अर्हता में प्रभेद है।
अधिक विकसित इकाई कम विकसित के विकास में सहायक, सहयोगी दिशा निर्देशक एवं शिक्षक के रूप में प्राप्त है, जो माता-पिता, शिक्षक एवं उपदेशक के संबंधों में प्रत्यक्ष है, जो अनिवार्य है।
स्थापित संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों का निर्वाह ही प्रत्यक्ष व्यवहार है, जो सामाजिकता के लिए अनिवार्यतम तथ्य है। इसके निर्वाहनार्थ उत्पादन आवश्यक है, इसका क्षेत्र प्रसिद्ध है।
जागृत मानव का व्यवहार ही व्यवस्था, संस्कृति, सभ्यता व विधि को प्रकट करता है, जिसके लिए वह उत्सुक है। चूंकि व्यवहार विहीन मानव नहीं है, अत: व्यवहार के बिना मानव जीवन का कार्यक्रम सिद्ध नहीं होता है। अस्तु, व्यवहार मानव जीवन का अविभाज्य अंग है। विकास के क्रम में व्यवहार एक विधिवत् स्थिति है।