अविद्या एवं भय के परिणाम में दयनीयता, द्वेष एवं अभिमान के परिणाम से क्रूरता तथा संग्रह व भय के परिणाम से हीनता का प्रसव है।
विद्या का प्रत्यक्ष रूप निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य, असंग्रह का प्रत्यक्ष रूप आवश्यकता से अधिक उत्पादन, सरलता का प्रत्यक्ष रूप सामाजिकता, स्नेह का प्रत्यक्ष रूप सौजन्यता एवं अभय का प्रत्यक्ष रूप ही सहअस्तित्व है। अस्तु, असंग्रह व सभ्यता के योग से धीरता का, विद्या व अभय के योग से वीरता का एवं स्नेह व सरलता के योग से उदारता का प्रसव है।
उपरोक्त तथ्य ही मानव को स्पष्ट व सिद्ध करता है कि मानव की क्षमता, योग्यता, पात्रता ही उसका स्वत्व है जो निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही है। संपूर्ण उत्पादन इसी से होता है। संपूर्ण उत्पादन सामान्य एवं महत्वाकाँक्षा की सीमा में उपयोगी है, यही आवश्यकता है।
मानवीयता से परिपूर्ण होना ही स्वतंत्रता का प्रधान लक्षण है। स्वयं से तंत्रित होना एवं न्याय, समाधान प्रमाणित होना ही स्वतंत्रता है। यही जीवन चरितार्थता का लक्षण है।
वस्तु व जीव पर स्वत्व स्थापित करने व स्वेच्छा पूर्वक उपयोग करने का प्रयास भ्रमित मानव ने किया है। इसी को स्वत्व व स्वतंत्रता मानना ही अविद्या का प्रधान लक्षण है। अस्तु, यह सब उपयोगितावादी सिद्ध हुआ है न कि स्वतंत्रता का आधार।
मानव के स्वत्व में क्षमता, योग्यता एवं पात्रता है। उनके स्वाधीन (स्वबौद्धिकता के अधीन) में जिन वस्तु, स्थान व जीवों को पाया जाता है, उनकी अनिवार्यता मानव की उपयोग क्षमता में, से, के लिए ही है। क्षमता ही वहन, योग्यता ही प्रकटन एवं पात्रता ही ग्रहण क्रियाएं हैं, जो प्रत्येक मानव में प्रत्यक्ष हैं। साथ ही यही मानव का स्पष्ट रूप एवं अधिकार भी हैं। क्षमता, योग्यता एवं पात्रता ही मानवों का इकाईत्व, सीमा, संवेग, प्रवृत्ति, प्रतिभा, व्यक्तित्व, वहन, निर्वाह, निरूपण, निर्धारण, निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण एवं संयोजन है। यही उत्पादन, व्यवहार एवं अनुभव प्रमाण है।
वहनपूर्वक स्थापित मूल्यों का निर्वाह, शिष्टतापूर्वक शिष्ट मूल्यों का आचरण एवं व्यवहार, आचरण सहित भौतिक मूल्यों (उत्पादन मूल्यों) का समर्पण-अर्पण-उपयोगी सिद्ध हुआ है। यही स्वतंत्रता का मूल रूप है।
स्वत्व निर्वाह से, स्वतंत्रता प्रयोजन से, अधिकार उपलब्धि से प्रमाणित है।