“प्रबुद्धता का परावर्तित रूप प्रभुता, प्रभुता का परावर्तित रूप सत्ता, सत्ता का परावर्तित रूप शिक्षा, शिक्षा का परावर्तित रूप प्रणाली पद्धति व नीति, प्रणाली पद्धति व नीति का परावर्तित रूप चारों आयाम एवं दश सोपानीय व्यवस्था की एकसूत्रता और चारों आयाम व पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता ही प्रभुसत्ता है।
नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य देश कालातीत हैं, अत: सार्वभौमिक हैं। इसलिए सार्वभौमिकता ही अप्रतिमता, अप्रतिमता ही मध्यस्थता, मध्यस्थता ही प्रबुद्धता, प्रबुद्धता ही विज्ञान व विवेक, विज्ञान व विवेक ही सम्प्रभुता , सम्प्रभुता ही अखण्डता, अखण्डता ही समाधान एवं समृद्धि, समाधान एवं समृद्धि ही सहअस्तित्व, सहअस्तित्व ही जीवन एवं जीवन ही नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य है। मानव जीवन कार्यक्रम में विधि, नीति एवं व्यवस्था का समाहित रहना प्रसिद्ध है। जैसे :-
प्रभुता = विधानाभ्यास = सत्ता = नीति = व्यवस्था
सत्य = विधि, चिंतनाभ्यास = नीति = व्यवस्था
धर्म = विधि, शास्त्राभ्यास = नीति = व्यवस्था
न्याय = विधि, व्यवहाराभ्यास = नीति = व्यवस्था
नियम = विधि, कर्माभ्यास = नीति = व्यवस्था
विधि विहित नीति व व्यवस्था ही चारों आयामों एवं दश सोपानीय व्यवस्था की एकसूत्रता को स्थापित करती है। यही जागृत जीवन का प्रत्यक्ष रूप एवं कार्यक्रम है। यही अभ्यास का फलन है। यही जागृत मानव परंपरा का अभ्यास और अभ्यास का वैभव है।
सहअस्तित्व ही प्रभुता है, जागृति क्रम और जागृति परंपरा में अनिवार्य क्रिया, प्रक्रिया, स्थिति एवं स्थितिशीलता व गति ही सार्वभौमिकता है। जैसे - मानव के लिए मानवीयता पूर्ण क्रियाकलाप।
सार्वभौमिकता ही निर्विवाद एवं समाधान है।