अमानवीयता में असामाजिकता, मानवीयता में सामाजिकता एवं अतिमानवीयता में स्वतंत्रता, स्वराज्य प्रमाणित होता है, जो प्रसिद्ध है।
सामाजिकता से सम्पन्न हुए बिना मानव का अतिमानवीयता को पाना संभव नहीं है, क्योंकि जागृति एक सघन व्यवस्था एवं क्रम है। विचार सीमा में ही मानव स्वतंत्रता एवं परतंत्रता का अनुभव करता है, क्योंकि जागृत मानव का मूल मूर्त्त रूप आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति और प्रमाण ही है।
मानवीयता का उत्कर्ष ही अतिमानवीयता के लिये प्रेरणा है, क्योंकि पदार्थावस्था के परस्पर उत्कर्ष से प्राणावस्था; पदार्थावस्था व प्राणावस्था के उत्कर्ष से जीवावस्था; पदार्थावस्था, प्राणावस्था व जीवावस्था के उत्कर्ष से भ्रमित ज्ञानावस्था; पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था व भ्रमित ज्ञानावस्था के उत्कर्ष से भ्रांताभ्रांत ज्ञानावस्था; पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, भ्रमित ज्ञानावस्था एवं भ्रांताभ्रांत ज्ञानावस्था के उत्कर्ष से निर्भ्रान्त देव मानवीयतापूर्ण अवस्था; पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, भ्रमित ज्ञानावस्था, भ्रांताभ्रांत ज्ञानावस्था एवं निर्भ्रान्त देव मानवीयता के उत्कर्ष से निर्भ्रान्त दिव्य मानवीयता पूर्ण अवस्था प्रसिद्ध है।
चैतन्य क्रिया ही जागृति पूर्वक जागृति पूर्ण संस्कृति और सभ्यता को प्रकट करता है। इसी के आधार पर विधि एवं व्यवस्था स्पष्ट होता है।
सम्पूर्ण समाज के द्वारा जागृति के क्रम में जो कृतियाँ की जाती है वे संस्कृति के रूप में प्रत्यक्ष हैं। वर्तमान में उनका अनुशीलन क्रिया सभ्यता के रूप में है।
व्यक्तिगत रूप में जो संस्कार प्रवृत्तियों के रूप में हैं, वही परिवार की सीमा में आचरण, समाज की सीमा में आचरण एवं संस्कृति, राष्ट्र की सीमा में संरक्षण सभ्यता एवं व्यवस्था तथा अन्तर्राष्ट्रीयता की सीमा में विधि एवं सार्वभौम व्यवस्था सहज प्रमाण प्रसिद्ध है।
नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य अखण्ड हैं, क्योंकि इनकी मात्रा का निर्णय नहीं है। क्रमश: मानव अनुसरण, अनुशीलन, अनुगमन पूर्वक अनुभव के लिए बाध्य है। यही अखण्ड सामाजिकता और सार्वभौम व्यवस्था का स्पष्ट सम्भावनात्मक तथ्य है।