विलीन होती है न कि अमानवीयता में। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानवीयतापूर्ण जीवन परंपरा ही एकमात्र शरण है। इसी का दश सोपानीय व्यवस्था में निर्वाह करना ही एकसूत्रता, अखण्डता एवं समाधान सार्वभौमता है। प्रत्येक संतान को उत्पादन एवं व्यवहार व व्यवस्था में भागीदारी करने योग्य बनाने का दायित्व अभिभावकों में भी अनिवार्य रूप में रहता है क्योंकि प्रथम शिक्षा माता-पिता से, द्वितीय परिवार से, तृतीय परिवार के सपर्क सीमा से, चतुर्थ शिक्षण संस्थान से, पंचम वातावरण से अर्थात् प्रधानत: प्रचार, प्रकाशन, प्रदर्शन से तथा प्राकृतिक प्रेरणा से अर्थात् भौगोलिक एवं शीत, उष्ण, वर्षामान से प्राप्त होती है।
प्राकृतिक नियमानुसार ही कृषि एवं उद्योग की सफलताएं नियंत्रित होना पाई जाती हैं। जिनकी निरंतरता अनादि काल से अपेक्षित है। इस भूमि पर वर्षा, शीत, उष्णमान के संतुलन के लिये समुचित वन क्षेत्र के अतिरिक्त भूमि के क्षेत्रफल पर कृषि कार्य को सम्पन्न करने का अधिकार मानव को है। प्रत्येक भूमि में खनिज द्रव्य की ससीमता है क्योंकि भूमि स्वयं सीमित है। जिन खनिजों की क्रमिक उत्पत्ति है उन पर आधारित उद्योगों को विकसित एवं समृद्ध बनाना मंगल होगा। इसी आधार पर विस्तारित कृषि एवं उद्योग पूर्णतया सफल एवं उसकी भी अक्षुण्णता सिद्ध है।
प्राकृतिक ऐश्वर्य का मूल्य = शून्य, क्योंकि प्राकृतिक ऐश्वर्य के निर्माण में मानव का श्रम नियोजन सिद्ध नहीं हुआ है। प्रत्येक पीढ़ी अग्रिम पीढ़ी को जिन साधनों को प्रदान करती है वह उसकी अक्षुण्णता चाहती है न कि विनाश। यह सार्वभौम रूप में पायी जाने वाली मनोवैज्ञानिक अपेक्षा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मानव प्रत्येक मानव, समाज प्रत्येक समाज, वर्ग प्रत्येक वर्ग, राष्ट्र प्रत्येक राष्ट्र अथक प्रयास से जितने भी साधनों का निर्माण करते हैं उनमें स्वयं के उपयोग से अतिरिक्त अग्रिम पीढ़ी के लिए सुगम सन्निवेश (साधन सम्पन्न भविष्य) निर्माण करने का मंगलमय आशय एवं संकल्प समाया हुआ है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि जो जिन साधनों को बिना किसी श्रम नियोजन करतलगत किये हैं वे उनके उत्पादक नहीं थे। उसी साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि वे सभी साधन जो बिना श्रम नियोजन के उपलब्ध हुए हैं, यह विधि सम्मत सम्पति नहीं है। व्यवस्था ही विधि है। यही विकास एवं जागृति का क्रम है। विकास क्रम में अपव्यय नहीं है। अपव्यय के अभाव में साधनों के सम्पतिकरण की उपयोगिता एवं आवश्यकता सिद्ध नहीं होती है। तात्पर्य, साधनों के सम्पतिकरण की आवश्यकता तभी दृष्टव्य है जब मानव उत्पादन से अधिक उपभोग करने के लिए तत्पर हो। उत्पादन से अधिक उपभोग अमानवीयता