ऐषणा-त्रय में, से, के लिये एक सूत्रता प्रतिस्थापित करने योग्य चिंतन प्रक्रिया ही ईप्सा है। यही चिंतन क्षमता की विशालता को स्पष्ट करती है। चिंतनशीलता जीवन सहज कंपनात्मक गति की शालीनता है। कंपनात्मक गति स्पन्दनशीलता का परिचय ही है चिंतनशीलता। स्पष्टता हेतु की गयी धावन क्रिया ही स्पन्दन है। स्वयं तथा वातावरण में, से, के लिये ही धावन क्रिया प्रसिद्ध है। स्वयं तथा वातावरण से अधिक स्पष्टतावकाश, अवसर, आवश्यकता प्रमाणित नहीं है। स्पष्ट होना ही निर्भ्रमता है, स्पष्टास्पष्ट होना ही भ्रांताभ्रांत है और स्पष्ट न होना ही भ्रांति है। मानव में भ्रांति ही पीड़ा है यही अजागृति है तथा पीड़ा से मुक्ति के लिये उत्प्रेरणा है क्योंकि प्रत्येक मानव पीड़ा से मुक्ति, अजागृति से जागृति के लिये प्रयासशील है जो प्रसिद्ध है।
स्वयं की स्पष्टता चैतन्य क्रिया के रूप में है। वातावरण प्राकृतिक एवं वैयक्तिक भेद से गण्य है। वैयक्तिक वातावरण की स्पष्टता, अर्थ का उपार्जन, अर्थ का सदुपयोग, अर्थ की सुरक्षा, सामाजिक मूल्यों का शिष्ट मूल्यों सहित निर्वाह, शिक्षा, प्रसार, प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन एवं व्यवस्था के रूप में दृष्टव्य है। यही अखण्ड समाज की पुष्टि है।
विवेचनापूर्ण आचरण ही विचार है। विवेचनायें “तात्रय” की सीमा में मानव के संदर्भ में होती हैं। इसी श्रृंखला में जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व एवं व्यवहार का नियम संबंधी ज्ञान एवं तत्व मीमांसा है। फलत: व्यवहारिक “नियम त्रय” यथा प्राकृतिक, सामाजिक व बौद्धिक रूप में सिद्ध हुआ है।
संपूर्ण विवेचनायें परस्परता के निर्वाह में, से, के लिये हैं क्योंकि सत्ता में प्रकृति का वियोग नहीं है। अस्तु, प्रकृति में परस्परता का अभाव नहीं है। परस्परता का अभाव प्रमाण सिद्ध नहीं है। निर्भ्रमता ही जीवन में स्थिरता, जीवन के कार्यक्रम में दृढ़ता, स्वयं में पूर्णता, समाज में अखण्डता है। इसके लिये ही मानव ने अनवरत प्रयास किया है। मानव जीवन का कार्यक्रम केवल समाधानात्मक भौतिकवादीय, व्यवहारात्मक जनवादीय, अनुभवात्मक अध्यात्मवादीय क्रम, नियम, नीति, सिद्धांत संबद्ध है।
समाधानात्मक भौतिकवादी कार्यक्रम की चरितार्थता आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में भी प्रस्तावित है, जिसके लिये मानव में शिक्षा एवं शैक्षणिक क्षमता, निपुणता एवं कुशलता के रूप में है। यही उत्पादन क्षमता है। यही क्षमता उपयोगिता एवं कला मूल्य को प्राकृतिक ऐश्वर्य पर प्रतिस्थापित करती है। व्यवहारात्मक जनवादीय जीवन का मूल तत्व जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य है। यह शिष्टता मानवीयता पूर्वक संयत सिद्ध हुई है।