का प्रधान लक्षण एवं उसकी सफलता है। यही उनकी क्षमता योग्यता पात्रता पर; यही उनकी जागृति विधि पर; यही संस्कार पर; यही शक्तियों के सदुपयोग एवं प्रयोजनशीलता पर; यही वातावरण एवं अध्ययन पर; यही संस्कृति एवं सभ्यता पर; यही व्यवस्था पर; यही विधि व्यवस्था व नीति पर; यही प्रबुद्धता व प्रभु सत्ता पर; यही विवेक व विज्ञान के संतुलन पर; यही निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य पर; यही दर्शन, ज्ञान, विवेक, विज्ञान पर आधारित होना पाया जाता है।
पदार्थ व प्राणावस्था का मूल्याँकन उत्पादन निमित्त, जीवावस्था का मूल्यांकन उपयोगिता व पूरकता निमित्त, ज्ञानावस्था का मूल्यांकन सहअस्तित्व में सतर्कता-सजगता सहित समाधान समृद्धि, अभय, सहअस्तित्च के रूप में और मानवत्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में है।
भौतिक समृद्धि, बौद्धिक समाधान, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व की उपलब्धि है। यही दश सोपानीय व्यवस्था में सामाजिकता का प्रत्यक्ष रूप है, जो सफलता है। इसकी नित्य संभावना है। यही मानव की चिर अभिलाषा है। यह मानवीयता पूर्वक ही सफल होना प्रत्यक्ष है।
संवेदनशीलता एवं संज्ञानशीलता की अभिव्यक्ति चैतन्य क्रिया में है। वह ज्ञानावस्था में विशेष रूप में पाया जाता है। यह आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति सहज प्रमाण है जो क्रम से सुख, शान्ति, संतोष, आनंद व परमानन्द की तृषा और तृप्ति है। इसका प्रत्यक्ष रूप ही भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान है। चैतन्य क्रिया ही ज्ञानावस्था का प्रधान लक्षण है। उसी में, से, के लिये संपूर्ण कार्यक्रम है। आशा आदि पाँचों क्रियाओं के अभाव में कोई कार्यक्रम सिद्धि का प्रमाण नहीं है।
सम्यकता (पूर्णता) के प्रति जिज्ञासा ही संचेतना है। पूर्णता त्रय (गठन, क्रिया, आचरण) के रूप में दृष्टव्य है। “अनुभूति ही सम्यकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।” इसी क्रम में सम्यक अनुभूति, सम्यक संकल्प (सम्यक बोध), सम्यक चिंतन, सम्यक विचार, सम्यक आशा के योगफल में ही प्रयोग एवं व्यवहार प्रमाण भी है। यही प्रमाण त्रय है। यही जीवन के कार्यक्रम को स्पष्ट करता है। जिससे बौद्धिक समाधान, भौतिक समृद्धि प्रकट होती है। यही मानव की चिर ईप्सा है। प्राप्य के प्रति तीव्र इच्छा ही ईप्सा है।