के अतिरिक्त और कहीं किया जाना संभव नहीं है। अस्तु, अपव्ययता के लिये अत्याशा का होना, अत्याशा के लिये हीनता, दीनता, क्रूरता का होना देखा जाता है।
साधन व स्थान के सम्पतिकरण के अभाव में उसका वितरण व्यवस्था प्राथमिकत: सुलभ हो जाएगा जिससे प्रत्येक व्यक्ति के लिये साधन व स्थान का अभाव नहीं रहेगा। अपव्यय से रहित जीवन में अधिक स्थान, अधिक साधन स्वयं में पीड़ा दायक सिद्ध है। अधिक साधन अधिक स्थान को संग्रह करने के मूल में भय की पीड़ा एवं अपव्यय के आग्रह का अनिवार्य रूप में रहना पाया जाता है।
श्रम नियोजन, श्रम विनिमय पद्धति से प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सेवा व वस्तु को दूसरी सेवा व वस्तु में परिवर्तित करने की सुगमता होती है, जिसमें शोषण, वंचना, प्रवंचना एवं स्तेय की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं जो अपराध परंपरा का वृहद् भाग है। ये संभावनाएं जागृति पूर्वक मानवकृत वातावरण, प्रधानत: व्यवस्था पद्धति एवं शिक्षा से ही निर्मित होती है।
उत्पादक या उत्पादन के लिये सहायक कोटि में ही प्रत्येक मानव गण्य है। उत्पादन क्षमताएं सामान्य, विशेष एवं विशिष्ट प्रभेद से गण्य है। उत्पादन के आधारभूत तथ्य शिक्षा, साधन, विनिमय एवं संरक्षण है। यही व्यवस्था का स्पष्ट रूप है। उत्पादन की गति को द्रुतगामी बनाने के लिये तारतम्यतापूर्ण सुदृढ़ व्यवस्था की अनिवार्यता निरंतर है जिससे आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना स्वभाव हो जाता है। फलत: अरक्षा एवं दुरूपयोग का दूर हो जाना पाया जाता है।
अर्थ की सुरक्षा एवं सदुपयोग ही समाधान है। यही समाधानात्मक भौतिकवाद का प्रत्यक्ष रूप है। “सदुपयोग एवं सुरक्षा अनन्यशील है।” नियम समाधान में, से, के लिये है।
न्याय, अनुभव और व्यवहार में, से, के लिये है जो प्रसिद्ध है। यही व्यवहारात्मक जनवाद को स्पष्ट करता है। न्याय पाने की साम्य कामना ही व्यवहारात्मक जनवाद का आधार है, मानवीयता पूर्वक “नियम त्रय” का पालन होता है यही न्याय है, जिसका प्रत्यक्ष रूप संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति एवं आवश्यकता से अधिक उत्पादन और अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा है। यही जनाकाँक्षा है। जनाकाँक्षानुरूप व्यवहार, व्यवस्था, प्रक्रिया ही जनवादीय तंत्र का उद्देश्य है। तदनुरूप व्यवस्था व शिक्षा का सर्वसुलभ होना ही व्यवहार है। जनवादीय तंत्र से जनवादीय व्यवस्था एवं शिक्षा, जनवादीय व्यवस्था शिक्षा से जनजाति में व्यवहार, जनजाति में