शिष्ट मूल्य में उत्पादन मूल्य समर्पित होने के लिए बाध्य है क्योंकि शिष्ट मूल्य के अभाव में उत्पादित वस्तु मूल्य का संयमन एवं सदुपयोग सिद्ध नहीं होता। अस्तु, उत्पादित वस्तु मूल्य शिष्ट मूल्य में; शिष्ट मूल्य स्थापित मूल्य में; स्थापित मूल्य मानव मूल्य में; मानव मूल्य जीवन मूल्य में संयोजित विधि से प्रमाणित होता है। शिष्ट मूल्य के संयोग में ही उत्पादित वस्तु मूल्य का सदुपयोग सिद्ध हुआ है। सामाजिक मूल्य के संयोग में ही उत्पादित वस्तु मूल्य का सदुपयोग सिद्ध हुआ है। सामाजिक मूल्य अर्थात् प्रत्येक संबंध में स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्य वर्तमान होना पाया जाता है। सामाजिक मूल्य में, से, के लिये ही शिष्ट मूल्य की गरिमा-महिमा गण्य है। सामाजिक मूल्य के अभाव में शिष्ट मूल्य की व्यवहारिक मीमांसा सिद्ध नहीं हुई है। अपितु स्थापित मूल्यों के अनुगमनशीलता में ही शिष्ट मूल्यों की मूल्यवत्ता एवं महत्ता स्पष्ट हुई है। अस्तु, स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्य का समर्पित होना अवश्यंभावी है। स्थापित मूल्य का निर्वाह मानव मानवीयता पूर्वक करता है। यही मानव का व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संतुलन है। यही उसका आचरण है। इसके सहकारी परिवार, प्रोत्साहन योग्य समाज, संरक्षण-सवंर्धन योग्य व्यवस्था अर्थात् विधि व्यवस्था शिक्षा, संतुलन एवं अनुकूल परिस्थति निर्माण करने योग्य अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ही “वादत्रय” का चरितार्थ रूप है।
समाधानात्मक भौतिकवादीय सिद्धांतों के आधार पर ही कृषि एवं औद्योगिक कार्यों में अधिकाधिक व्यक्तियों की भागीदारी उत्पादनों की विपुलता चरितार्थतावश प्रत्यक्ष होती है।
बहुभोगवादी भौतिकवादी व्यापार मूलक व्यवस्था (उत्पादन एवं वितरण व्यवस्था) आद्यान्त असफल सिद्ध होती है क्योंकि उपयोग एवं सदुपयोग की संयमता एवं नियंत्रण मानवीयता पूर्वक “नियम त्रय” पद्धति से ही सफल होती है, स्पष्ट है।
व्यक्तित्व व उत्पादन क्षमता सम्पन्न करने का दायित्व शिक्षा, व्यवस्था एवं नीति पर आधारित पाया जाता है। यही व्यवस्था का प्रत्यक्ष स्त्रोत है। प्रचार, प्रकाशन, प्रदर्शनपूर्वक उसे प्रोत्साहित करने का दायित्व विद्वता, कला, कविता सम्पन्न समाज का है जिनसे ही सामान्य जनजाति प्रेरणा पाती है, जो तथ्य है। परस्पर राष्ट्रों में संतुलन सामंजस्य एवं एकसूत्रता को पाने के लिये प्रत्येक राष्ट्र को मानवीयता पूर्वक “नियम त्रय” का पालन करने के लिए उन्मुख होना ही होगा। सार्वभौमिकता ही सभी राष्ट्रों के अनुमोदन के लिये आधार रहेगा। सामाजिक सार्वभौमिकता अर्थात् अखण्डता ही सभी राष्ट्रों का मूल आशय है। उसकी स्पष्ट सफलता न होने का कारण मात्र वर्गीयता है या वर्गीयता का प्रोत्साहन एवं संरक्षण है। यह सभी वर्गीयताएं मानवीयता में ही