नियति क्रमानुसरण प्रक्रिया ही नीति है। नियति क्रम ही विकास एवं जागृति क्रम है। नियति क्रमानुषंगिक प्रगति ही गुणात्मक परिवर्तन है। प्रत्येक पद में, से, के लिये निश्चित अर्थवत्ता प्रसिद्ध है। नियति क्रमवत्ता से सम्बद्ध उपयोगिता, उपादेयता और अनिवार्यता की सिद्धि तथा सिद्धि पूर्वक अग्रिम कार्यक्रम ही पद्धति है। यही गुणात्मक परिवर्तन परंपरा है। यह तब तक रहेगा जब तक आचरण पूर्ण न हो जावे। इसी पद्धति में आश्वासन एवं विश्वसन स्वभाव से सिद्धियाँ हैं।
गुणात्मक परिवर्तन पद्धति स्वयं सिद्धांत, विकास एवं जागृति है। ह्रास मानव के लिये वांछित घटना नहीं है। समाज की अखण्डता में, से, के लिये सार्वभौम व्यवस्था मानव परंपरा में एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
व्यवस्था के मूल में सत्यतापूर्ण प्रबुद्धता ही आधार है। प्रबुद्धता जागृतिपूर्वक सार्थक होने वाला पद है। प्रबुद्धता का सामान्यीकरणार्थ ही व्यवस्था की अनिवार्यता है। व्यवस्था मानव में वांछित घटना है।
परिवार एवं वर्ग में जितनी भी संस्थायें हैं, ये प्रथम एवं द्वितीय अवस्था में गण्य हैं। इनके द्वारा किये गये सभी प्रयोगों की असफलता ही सामाजिकता के लिए अर्थात् संस्था की तृतीय अवस्था के लिये बाध्यता है। संस्था का सार्वभौम होना अनिवार्य है। सार्वभौम सामाजिक संस्था मानवीयता पर आधारित वास्तविकताओं की अनुसरण पद्धति ही है। व्यवस्था का स्वत्व और व्यवस्थापीय कार्यक्षेत्र के मध्य में तारतम्यता का अभाव ही व्यवस्था का पराभव है। सार्वभौम संस्था के कार्यक्रम में पराभवता की संभावना नहीं है। मानव के लिये मानवीयता ही वांछित वैभव है।
मानव जीवन की विधि एवं नीति संहिता में असंदिग्धता ही शिक्षा में पूर्णता है। व्यवस्था की सफलता उसके कार्यक्षेत्र के अंतर्गत पाई जाने वाली जनजाति में तारतम्यता ही असंदिग्धता का प्रत्यक्ष रूप है। विधि संहिता ही मानव जीवन संहिता है। यही प्रकृति के विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति की भाषाकरण संहिता है। उसका अनुकरण, अनुसरण और आचरण प्रक्रिया ही नीति है। यही मानव जीवन का कार्यक्रम है।