मानवीयता पूर्ण व्यवस्था अथवा सार्वभौमिक व्यवस्था के अर्थ में जनवादी तंत्र को दश सोपानीय विधि से निर्देश किया है। मानवीयतापूर्ण संस्कृति, सभ्यता को प्रत्येक मानव जीवन में चरितार्थ करना चाहता है, जिसके लिये ही वह संस्था में स्वयं को समर्पित करता है।
जागृत जनवादी तंत्र ही वर्ग, जाति सम्प्रदाय एवं मत की सीमाओं से मुक्त, मानवीयता से सम्पन्न तंत्र व्यवस्था है। यही सभी संस्थाओं की प्रकारान्तर में की गई काँक्षा भी है। यही स्पष्टता सार्वभौम व्यवस्था तंत्र की संभावना को स्पष्ट कर देती है। अनिवार्यता का संयोग ही इसकी सफलता है।
मानवीयता पूर्ण व्यवस्था अथवा सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में जनवादी व्यवस्था तन्त्र को दश सोपानीय परिवार सभा विधि से सार्थक होने के अर्थ में निर्देशित किया है।