क्षेत्र और वर्ग सीमा पर आधारित विधि अर्थात् अपराध संहिता और उसकी व्याख्या का सार्वभौम होना संभव नहीं है। इसी सत्यतावश सार्वभौम जीवन क्रम, जीवन के कार्यक्रम में संक्रमित होने के लिये आवश्यकता उत्पन्न हुई है।
सार्वभौम विधि संहिता मानवीयतापूर्ण पद्धति से “नियम त्रय” का विश्लेषण है। दश सोपानीय व्यवस्था में जिसका पालन एवं व्यवहृत हो जाना ही उसकी चरितार्थता है। यही सर्वमानव की कामना है। यही आप्त पुरुषों का उपदेश है। नीति का आधार विधि है। नीति सम्मत वस्तु, विषय, पद्धति एवं प्रक्रिया ही लोकाकाँक्षा से सम्बद्ध होती है, होना ही है। नीति केवल दो ही है:- प्रथम - धर्म नीति, द्वितीय - राज्य नीति।
ये दोनों नीतियाँ अर्थतंत्र सहित वैभव है। अर्थ तन, मन और धन के रूप में प्रमाणित हैं। मानव संतृप्त होने के लिए आश्वस्त, विश्वस्त होना चाहता है। अर्थ के सदुपयोग में विश्वास धर्म नीति, अर्थ की सुरक्षा में विश्वास राज्य नीति सहज सिद्ध होता है। अर्थ के उत्पादन, वितरण एवं उपयोग से ही सदुपयोग स्पष्ट होता है। सदुपयोगात्मक एवं सुरक्षात्मक नीति ही मानव की आकाँक्षा है। परिवार एवं वर्ग सीमा से मुक्त संस्था ही सार्वभौम संस्था है। ऐसी संस्था में मानव जीवन, मध्यस्थ दर्शन सहित, स्वभावत: समाविष्ट रहती है। फलत: मानव जीवन के कार्यक्रम का क्रियान्वयन होता है। दर्शन क्षमता के अनुरूप में कार्यक्रम का निर्धारण संस्थाओं ने किया है। असंदिग्ध कार्यक्रम केवल मानवीय संस्कृति, सभ्यता पर आधारित विधि व्यवस्था ही है। इसका प्रत्यक्ष रूप ही है व्यवहारिक “नियम त्रय” का पालन। नियम त्रय का प्रत्यक्ष रूप ही शिष्ट मूल्यों सहित संपूर्ण स्थापित मूल्यों का निर्वाह है। यही अखण्ड समाज, सहअस्तित्व, समाधान एवं समृद्धि है।
भ्रमित परंपरा में भी संस्थाओं ने शासक तंत्र व्यक्तिवादी राजतंत्र, सभावादी राजतंत्र, समाजवादी राजतंत्र, पूंजीवादी राजतंत्र, साम्य राजतंत्र, गणतंत्र एवं जनवादी तंत्र के प्रभेदों में से व्यवस्था का प्रयोग करने का प्रयास किये हैं। जिसमें से पहले तीन प्रकार के प्रयोग हो चुके हैं। गणतंत्र भी वर्ग संघर्ष से मुक्त नहीं हो पाया है। शासन संस्था तंत्र गणवादी तंत्र की अपेक्षा में संकीर्ण; शासक तंत्र शासन संस्था तंत्र की अपेक्षा में संकीर्ण पद्धति प्रक्रिया के प्रयोग किये हैं उसी आधार पर वर्ग संघर्ष एवं युद्ध हुए हैं।