देने लगे। इस ढंग से - डर भय से - जीने वाली बात इश्वरवाद से आई है। ये लिखा ही है, उसको और थोड़ा स्पष्ट कर दूँ - भय प्रलोभन जो बताएं हैं - स्वर्ग-नर्क, भय-प्रलोभन - जोड़ा है ये। नर्क के प्रति भय पैदा करना और स्वर्ग के प्रति प्रलोभन पैदा करना - जितने भी परिकथाएं लिखी गई है, इसका मतलब उतना ही है। जो आदर्शवादी विधि से परिकथाएं हैं, असंख्य परिकथाएं लिखित रूप में आ चुकी हैं - आप लोग देख भी सकते हैं, देखे भी होंगें। ये मेरा सोचना है। इस ढंग से क्या हुई? डर भय से मुक्ति आवश्यक है मनुष्य को, हर मनुष्य यह सोचता है डर ना रहे, हर मनुष्य यह चाहता है भय न रहे और हर मनुष्य यह चाहता है, कहीं ना कहीं, हम विश्वासपूर्वक जी सके, यह तो हर मनुष्य में निहित है ही। मनुष्य अपने में विश्वास करना, जब तक भय है, तो कहाँ से विश्वास करेगा भाई? इसके लिये डर भय के स्थान पर समाधान समृद्धि उपस्थित हो सके और ये स्थिति को हमने देख लिया, जी लिया, उसके बाद हमने सोचा अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन है ये।
ये चिंतन कहाँ से आ गई? अस्तित्व तो था ही, मानव था ही, किन्तु यह सीधा अस्तित्व से सारा-सारा सूत्र को, किस सूत्र को - जीने के सूत्र, number १, जीने में सुख को अनुभव करने के सूत्र, समाधानित होने के सूत्र, समृद्ध होने के सूत्र, वर्तमान में विश्वास करने का सूत्र और सहअस्तित्व में जी रहे हैं, इस बात को प्रमाणित करने का सूत्रों को हासिल कहाँ से करता है? अस्तित्व से करता है। प्रकाशित कौन करता है? मानव ही करता है, दूसरा कोई करने वाला नहीं है। कितने भी चीख लें, चिल्ला लें, और दूसरा कोई करेगा नहीं, जीव संसार ये काम करेगा नहीं, वनस्पति संसार ये करेगा नहीं और पदार्थ खनिज ये तो करेंगें नहीं। इस ढंग से ये बात अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन का आधार बना। क्या चीज़ से? जो वर्तमान में प्रमणित होने के धरती से। ये भी नहीं है कि आपको बात बता दिया, ऐसा नहीं है। वर्तमान में प्रमाणित होने की धरती से ये नाम पड़ा।
अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन विधि से ही हर मानव समाधानित होगा अध्ययन से और अनुभवमूलक विधि से ये समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को प्रमाणित करेगा। जो समाज का वांछित फल है। समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व - ये चार जो फल है, ये चारों चीज़ मानव जाति की अपेक्षा है। ये चारों एक आवश्यकता के रूप में रखी हुई है। इसको सार्थक बनाना अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन से ही सार्थक हुआ। क्यों हुआ? आदमी ज़िम्मेवार बनता है, इस आधार पर वो बन जाती है। समझदारी के बाद ईमानदार होता है, ईमानदारी के बाद ज़िम्मेवार होता है, ज़िम्मेवारी के बाद भागीदारी करता है। भागीदारी का फलन है समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व। इस ढंग से अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन का नाम रखना उचित समझा। इसमें और भी जो मेधावियों का सुझाव संभावित है और उसको हम स्वागत करते ही हैं, और इसमें यदि कोई न्यूनतः हो, उसको पूरा करने के लिये हम पूरा तत्पर हैं।
इस संबंध में जितना भी प्रश्न होगा, उसका उत्तर हमारे पास है सार्थकता के आधार पर। एक - अस्तित्व ध्रुव है, दूसरा - मानव में जागृति ध्रुव है। जागृति ध्रुव होने के बाद उसका कसौटी यहाँ आती है - क्या मानव समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जी रहा है? जीने के लिए तत्पर है? इस कसौटी से ये दोनों चीज़ प्रमाणित हो जाते हैं - अस्तित्व भी और जागृति भी। इस तरीके से ये दोनों चीज़ प्रमाणित हो जाते हैं। कौन चीज़? अस्तित्व भी और जागृति भी। मानव में ही जागृति प्रमाणित होगी और कोई जीव जानवर और दीवाल इससे प्रमाणित होने वाला नहीं है। जागृति हर मानव में प्रमाणित होने की स्थिति में समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व निरंतर वर्तमान में