आ गया। हम ये सब कुछ करते हुए ही आए। इससे ये पता चला और भी अच्छी ढंग से हमको ये समन्वित[1] भी हुए, संबद्ध[2] भी हुए, प्रमाणित भी हुए - ये सब के बाद जो हमारा समझदारी आई, हम सहअस्तित्व में जीने में सार्थक हो गये। सहअस्तित्व में जीने के लिए तैयारी कर लिए तो क्या परिवर्तन हो गया भाई? हर समस्या का समाधान हमारे पास, हर परिस्थिति में हम अपने में समृद्ध हैं, हम पराधीन नहीं है। हम भयभीत होने का कोई जगह नहीं हैं, हम अपने पुरुषार्थ से हम समृद्धि का अनुभव करते है, अपने ही पारमार्थिक अर्थात अभ्यास विधि से हम समझदारी से संपन्न हो जाते है, समाधान से परिपूर्ण हो जाते हैं। अब अभ्यास का दो ही विधि बनी - एक तो यह विधि बनी - समझदार बनने के लिए अभ्यास करिये, उसको हम जिज्ञासा कहते हैं। दूसरा समझदारी को प्रमाणित करने में अभ्यास करिये, ध्यान दीजिये, ऐसा मैं कहता हूँ, जो कि मैं स्वयं करता हूँ। इस ढंग से सहअस्तित्ववाद का प्रयोजन जीने की जगह तक पहुँचा। जीने में आने में क्या बनता है? समाधान, समृद्धि पूर्वक हर परिवार में जीना बनता है, ये मुख्य बात है।
उससे जो उपकार का रास्ता बनी बहुत लंबा बनी, ऐसा हर परिवार यदि हो सकता है, नहीं हो सकता है - बात आई - उसके बाद ये हुआ, हम जो समझा हूँ, दूसरा कोई समझ सकता है कि नहीं, इसको कसौटी में लाने की आवश्यकता आई। जो समझा हूँ, उसको और हमारे मानव परंपरा में जो है, उनमें डालने की कोशिश की, ऐसा लगा कि दूसरों को ये पहुँचता है। यहाँ आ गए। उसका प्रमाण भी धीरे-धीरे धरती में उदय होने लगी, उसमें और भी हम सुदृढ़ हुए। इस ढंग से हम जो समझा हूँ इसका प्रमाण हम किसी को समझाना, वो दूसरे को समझाने पर वो अंतरित हो जाना, अर्पित हो जाना - इस स्थिति में हम प्रमाणित होते हैं। हम समझ गया हूँ, हम हमारे में कोई प्रमाण नहीं है।
सहअस्तित्व में ही प्रमाण होगा। इस ढंग से समझा करके ही हम समझदार प्रमाणित होता हूँ। हम किसी को सिखा करके ही हम सीखा हुआ हूँ, इस बात का प्रमाण हो पाता है। किसी को उपलब्ध करा दिया तो हमारा उपलब्धि होना भी प्रमाणित हो जाति है। इस ढंग से ये तीनों जगह में - कुछ पाने के लिये, कुछ करने के लिये, कुछ समझने के लिये - आदमी जिज्ञासु है। इन जिज्ञासा में सबसे बाधक है भय। भय जो है ना ईश्वरवाद - ईश्वरवाद को जब तक हम ओढ़े रहते हैं - तब तक हम भय से मुक्ति नहीं पायेंगें। ईश्वरवाद का क्या मतलब है? ईश्वर सब कुछ करता है। इस भ्रम को छोड़ देना चाहिये। ईश्वर की ताकत से हम सब भरे हैं - इसको उपयोग करके हम समृद्ध हो सकते हैं, समाधानित हो सकते हैं - इस ढंग से सोचने की आवश्यकता है।
ये कुल मिला करके सहअस्तित्व की, सहअस्तित्ववादी विचार का, मूल रूप ऐसा आता है। क्यों ऐसा कहते हैं भाई? उसका जो बहुत साधारण बात है - जैसा आप हमारे बीच में जो रिक्त स्थली है, यही स्वयं में व्यापक वस्तु है। हर परस्परता में यह रिक्तता रहती है, ये खाली स्थली रहती है। एक परमाणु अंश से लेकर दूसरे परमाणु अंश के बीच में ये रिक्त स्थली रहती है। यदि गणितीय भाषा का एक संख्या भी मानते है, हम गणितीय भाषा को वस्तु मानते है, विद्वानों ने अभी तक ये भी माना है - गणितीय भाषा को संख्या भी मानते हैं। संख्य विधि से यदि किसी एक को विखंडित करते चलें जाएँ, कितना भी विखंडित करें, एक टुकड़े से दूसरा टुकड़ा के बीच में यह रिक्त स्थली रहती है। रिक्त स्थली से मुक्त कोई होता ही नहीं, कितना भी टुकड़ा करिए, सभी टुकड़े के सभी ओर यह रिक्त स्थली रहेगी।