प्रमाणित होगी। फलस्वरूप आदमी जो अमन चैन चाहता रहा, सुख समृद्धि चाहता रहा, जान-माल का सुरक्षा चाहता रहा आदिकाल से, वो सार्थक हो जाता है। अभी तक वो सार्थक नहीं हुआ। धर्म तंत्र से भी नहीं हुआ, राजतंत्र से भी नहीं हुआ। इसलिये अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ही इस जगह में पहुँचाने के लिये सार्थक है, इसको मैंने देखा है। इसमें मैं जिया है, इसमें मैं स्वयं प्रमाणित हूँ। इसके आधार पर उसका नाम दिया।
जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!