आदर्शवादी विधि से ईश्वर सब को जीवन प्रदान करते हैं, प्राण रूप है, प्राण से ये सब कुछ संचालित होते हैं - ऐसा बताया। उसके बाद कहा कि आत्मा के रूप में सब को संचालित करते हैं - वो प्राण से आत्मा में आ गए। आत्मा में आने के पश्चात आत्मा के बारे में जब वाद-विवाद हुआ, चर्चाएँ हुई है, आत्मा को स्पष्ट करने में असमर्थ रहे। अध्यवसायिक[1] विधि से आत्मा स्पष्ट नहीं हुई। इस ढंग से आदर्शवादी बात यहाँ रुक गयी। माने आगे विकसित होना संभव नहीं हुआ और प्रेरणावादी बात तो परस्परता में मनुष्य में कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ तो है ही है। एक दूसरे मनुष्य के लिए प्रेरक होता ही है। इसके आधार पर बहुत सारे साधना विधि नियन्ति[2] तैयार कर लिया। उसको भी बहुत सारे लोग प्रयोग किए। प्रयोग करने के बाद यह तो नहीं निकला कि मनुष्य कि जो आवश्यकता है सुख, सुख के मूल में यह शोध करके देखा गया है - समाधान। सुख के मूल में समाधान के बिना मनुष्य को सुख मिलने वाला नहीं। समाधान के मूल में समझदारी। समझदारी जो है स्वयं मनुष्य का अध्ययन हो जाए - समझदारी कहा जाए, अस्तित्व का अध्ययन हो जाये - समझदारी कहा जाये। इससे ज्यादा कुछ होता नहीं है इससे कम में समझदारी होती नहीं।
इस ढंग से आदमी जात के सम्मुख - चाहे वरदान कहिए, चाहे अभिशाप कहिए, ये अपने सम्मुख आ गया है। इसको जो कुछ भी आप नाम दो। इस क्रम में हम यहाँ पहुँचते हैं - मनुष्य अध्ययन करने योग्य है कि नहीं है? उसको जांचा। जाँचने पर पता लगता है की अध्ययन करने योग्य है। अध्ययन क्या - आँख, नाक, पैर अध्ययन करता है या और कोई चीज़ करता है? पता चला और कोई चीज़ करता है। और कोई चीज़ करता है तो आदर्शवादीयों के आधार पर आत्मा होता है और सहअस्तित्ववादी विधि से बनता है - जीवन अध्ययन करता है। यह बात बनी। पहले से आत्मा को अध्यवसायिक विधि से बोधगम्य कराना असंभव था, अभी जीवन को अध्यवसायिक विधि से हम बोधगम्य कराने में सफल हो गया हूँ। कुल मिला करके यह एक प्रकार से उत्सव की बात कहिये या हमारा उत्साह की बात कहिये, संभावना की बात कहिये - जैसा भी आपको मन पड़ता है - वोही बात को आप अपनाइए। इस जगह में हम आ गए।
इस जगह में आने के बाद हम मनुष्य का अध्ययन में लगे। शरीर का अध्ययन करने पर यह पता चला, गर्भाशय में मनुष्य का शरीर भी रचित होता है। यह पता चला। गर्भाशय से बाहर होने के बाद बड़ा होना, माने रोगी रहना या स्वस्थ रहना, यह सब चीज़ शरीर के साथ जुड़ी हुई है। किंतु रोगी शरीर हो या स्वस्थ शरीर हो गर्भाशय में ही रचित होता है, यह बात का पुष्टि मिल गई। संभवता अभी जो शरीर शास्त्री, शरीर शास्त्र को जितना अध्ययन किए हैं, उनका भी ऐसा निष्कर्ष होना चाहिए संभवता, उसी आधार पर यह कृत्रिम[3] रूप में भी शरीर रचना की बात सोचते हैं और प्राण कोशायें नहीं बन पाई, फल स्वरुप कृत्रिम रूप में शरीर रचना की कल्पना अधूरा है, वो अभी स्थगित करके रखा हुआ है। आगे चल करके आवश्यकता पड़ने पर अनुसंधान करेंगे, शोध करेंगे, जो सफलताएँ मिलेंगी वो मानव सम्मुख आवे करेगा। इस ढंग से एक तरफ ये आ जाता है कि मानव शरीर रचना गर्भाशय में ही होता है। यह गर्भाशय