उसको मध्यस्थ दर्शन नाम दिया है। नाम कैसा दिया? क्योंकि विज्ञान ने अछूता रखा और आदर्शवाद ने अछूता रखा था। किसका? ये मनुष्य का अध्ययन को। मनुष्य जो है ना जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में, सहअस्तित्व में है - इस बात का अध्ययन नहीं कर पाया, फलस्वरूप मनुष्य अपने में विश्वास करना नहीं बना, फलस्वरूप हम कहीं ना कहीं लटके रहना, किसी बैसाखी को खोजते ही रहना, ये बनते ही आया, आज भी उसी स्थिति में आदमी जात है।
आदमी जात की इस विपन्नता को दूर करने की संभावना है। किस विधि से? सहअस्तित्ववादी विधि से। इन दोनों के हाथ से छूट गया था, इसी लिए मध्यस्थ दर्शन। इन दोनों की दर्शन विधाओं से, चिंतन विधाओं से, जो हाथ से छूट गई थी - क्या चीज़ छूटा भाई? जीवन। जीवन का प्रतिपादन इन दोनों विधाओं से छूटी थी, इसी लिए ये मध्यस्थ दर्शन हुई। ये निरंतर व्यवस्था में जीता है, इसी लिये सहअस्तित्ववाद है, इस ढंग से ये वाक्य बनता है। ये सतत् सभी जगह में सहअस्तित्ववाद का जो प्रतिपादन व्यवस्था के रूप में, हर वर्तमान में, नित्य वर्तमान में प्रमाणित होती जाती है। हर मनुष्य के अध्ययन से जीवन की अस्तित्व हमको समझ में आता है, आपको भी समझ में आएगी। हमको भी विश्वास होता है, आपको भी विश्वास होता है - इसके आधार पर ये मध्यस्थ दर्शन - ये आई। इस ढंग से मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद का सार संक्षिप्त स्वरूप प्रस्तुत हुआ।