ऊर्जा संपन्न हैं, बल संपन्न हैं - ये बात को कल भी एक बार बता चुकें हैं। वो बल सम्पन्नता ही है - चुंबकीय बल सम्पन्नता के रूप में विद्यमान रहता है। इसी से एक परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंश को पहचानना और स्वयं स्फूर्त विधि से व्यवस्था को प्रमाणित करना, क्योंकि अस्तित्व में यह भी देखा गया है प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था है समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। ये स्त्रोत है - स्वयं स्फूर्तता का स्त्रोत यही है। ये क्या हुआ? हर एक एक-एक व्यापक वस्तु में भीगे रहने से ये स्वयं स्फूर्तता स्वयं सिद्ध है।
यह अस्तित्व सहज है, शाश्वत है, नित्य है। यह कभी भी इसका विच्छेद होता नहीं - स्वयं स्फूर्तता। तो अस्तित्व रूप में हर वस्तु स्वयं स्फूर्त है, अस्तित्व में क्रियाशीलता के रूप में स्वयं स्फूर्त है और क्रियाशीलता के क्रम में, जागृति क्रम और विकास क्रम के रूप में स्वयं स्फूर्त है। यह पूरा का पूरा अस्तित्व इसी रूप में बैठा हुआ है। इसको समझने वाला केवल मानव है और केवल मानव है, केवल मानव है और कोई समझता नहीं है। इस आधार पर मानव को हमने इस ढंग से पहचाना - अभी तक अध्यात्मवादी- भौतिकवादी जीवों के रुप में पहचानते रहे, हम ज्ञान अवस्था की इकाई के रूप में मैंने पहचाना। इसलिए इसका नाम दिया है - यह ज्ञान अवस्था की इकाई है - मानव को। मानव ज्ञान अवस्था की इकाई होने के आधार पर ही भौतिक ज्ञान, रासायनिक ज्ञान, जीवन ज्ञान में जाग्रत होना बनता है।
अभी भी जो भौतिक ज्ञान रासायनिक ज्ञान किये हैं, यह जाग्रत हैं या भ्रमित हैं पूछा जाए, हमारे अनुसार भ्रमित हैं। क्योंकि इसका उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनशीलता को बिना पहचाने हम अपना हविस पूरा करने के लिए भौतिक रासायनिक वस्तुओं को उपयोग करने लगे, फल स्वरुप धरती रोगी हो गई। इस ढंग से ये समझे नहीं हैं, इस गवाही के साथ, ये विज्ञान संसार इसको पूरा समझा नहीं है। ‘नीम हकीम खतरे जान’[1] स्वाभाविक होते ही हैं। इस परिभाषा में विज्ञान की स्थिति आज है। यह बात हमको स्पष्ट हुई है, शायद आपको भी स्पष्ट होता ही होगा। अब इससे क्या हुई? धरती बीमार हो गई, धरती बीमार होने के बाद विज्ञानी, अज्ञानी, ज्ञानी - सभी धरती में ही हैं। ये सब को एक ही साथ डूबने की जगह आ गई, तब अब सोच रहै हैं - ये क्या होगा? आगे में क्या होगा। आगे भाई क्या होने की बात है - कोई सोचता है दूसरा कोई ग्रह गोल खोजेंगें, वहाँ हमारे जात-पात को ले जाएँगें, हमारे आदमी को ले जाएँगें, बाकी को मरने देंगें। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं। कुछ लोग ऐसे सोचते हैं - नहीं भाई यह ठीक नहीं है, हमको इसका कोई उपाय खोजना चाहिए - ऐसा भी चर्चाएँ होती रहती हैं। इसको हम सुनते ही रहते हैं।
तो चर्चाएँ तो होता है, किन्तु निष्कर्ष क्या निकला - इसको खोजने पर अभी तक तो कोई भी, कितने भी seminar होते हैं, सभाएँ होते हैं, विमर्शात्मक सभाएँ होते हैं, सभी को हम सुनते हैं पेपरों में। किंतु उसका कोई निष्कर्ष निकाला, ऐसा हुआ नहीं। अभी तक की जो बहुत बड़ी भारी - जो पारंगत कहलाते हैं, पर्यावरण संबंधी समस्याओं को समाधान देने के लिए जो पैदा हुए हैं, जिनको बहुत बड़ी भारी पद दी गई है, बहुत सारे मोटे-मोटे तन्खा दी जाती है, ऐसे लोगों के साथ हमारा चर्चा हुई है, उनके मत से यही है - अब मनुष्य को कितना पर्यावरण प्रदूषण में जी सकता है, उसी को हम पहचानना है, उसको हमें standard बताना है - ऐसा कह रहे हैं। यदि यही सच है तो अभी कोई अपने एक अवधि निश्चित करेंगे, इस अवधि तक आदमी जियेगा और आगे जियेगा नहीं। अभी आप ऐसा ही तय करेंगे। क्योंकि पहले जो है ना, कोई प्रदूषण था नहीं, उस समय में आदमी जीता ही रहा है। अभी प्रदूषण होने के बाद इतना
नीम हकीम खतरे जान : थोड़ा ज्ञान बहुत हानिकारक होता है ↑