समाई हुई है। पहले इस बात को अपने को स्वीकारना होगा, साक्षात्कार करना होगा, और उसको अवधारणा में अपने को स्वीकारना होगा। ठीक है। ये बनता है, तो मनुष्य भी मानवत्व सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करेगा। तो मानवीयता को हम पकड़ना बहुत जरूरी रहा, मानवीयता को पकड़ने के लिए मानव का परिभाषा चाहिए, मानव का परिभाषा होने के लिए जीवन और शरीर का व्याख्या चाहिए, वो हम कर नहीं पाये थे विगत में कहीं।
उसका कोई उदाहरण नहीं है, ठीक है, उद्दरण भी नहीं, उदाहरण भी नहीं है। तो हम अनेक लोगों को श्रेष्ठ मानव मानते आये हैं, ये बात सही है, ठीक है। इसको मान लेने में हमारा क्या गया है। कहीं न कहीं हमको, कहीं न कहीं धैर्य ढाढ़स से बना है, उपकार का ही, कृतज्ञता के ही भाव बना हुआ है, हम कहीं भी बरबाद नहीं हुए हैं। वो स्वयं, ये श्रेष्ठ मानव हुआ था, नहीं हुआ था, उनका जिम्मेदारी है, ठीक बात हो गया, हम किसी को, आपको श्रेष्ठ मानना हमारा कोई नुकसान नहीं है। आपका, आप अपने में श्रेष्ठ होने में ही आपका फायदा है, ये मेरा सोचना है, सोचने की तरीका ये है। हम आपको श्रेष्ठ मानने से, हमारा कोई नुकसान नहीं होता, हम इसको अलथा-कलथा करके देख लिया। ये मानने की बात हो गई, उसके बाद जानने की बात आता ही है, जानने की बात आने से पता चला मानवीयता पूर्ण मानव ही श्रेष्ठ मानव है, देव मानव ही उससे श्रेष्ठ मानव है, दिव्य मानव परम श्रेष्ठ मानव है।
ये बात आ ही चुका, ये पूरा झांकी अपने में सजने की व्यवस्था है ही है।अध्ययन की व्यवस्था है ही है। वो यदि ठीक लगता है, उसके लिए मन प्राण को निछावर करने की बात हर व्यक्ति के साथ जिम्मेदारी के रूप में जुडा ही है। जो इच्छा होता है निछावर करेगा, जो इच्छा नहीं होता है नहीं करेगा। क्या बात है? कोई नुकसान नहीं है। किन्तु इसमें जो हमारा उत्सव है, प्रयत्न है, और प्रयास है, इसमें जो हमको जो सुख मिलता है, इसमें कोई कमी भी नहीं होती है। पहले, देखिए आप भले ना करें, आपका सहमती तो आप व्यक्त करते ही हैं। क्या करते हो? सहमति तो व्यक्त करते हो, भले ना करो भाई। अच्छा, जो सहमति व्यक्त करते हो ना, उसी से हम जीवित रहता हूँ।
प्रश्न : सहमति जो है करने की पहली सीढ़ी है।
उत्तर : ठीक है ना, उतने से ही जीना हमको सुखद हो गया, यदि आप प्रमाणित ही हो गया, तो हम कैसे होंगे, आप सोच लो।