ज़िम्मेवार मिलते भी तो जा रहे हैं। इन आधारों पर हम विफलता में भी खुश रहते हैं, सफलता में भी खुश रहते हैं, क्योंकि बेहोशी में सुंदर ही दिखता है हमको। तो आज जहाँ विफलता रहती है भविष्य में उसका सुंदरता सफलता में ही दिखता है।विफलता सदा-सदा के लिए पूँजी है, हमको ऐसा दिखा नहीं है। विफलता क्षणिक है, सफलता ही निरंतर है। क्या बात है! क्या बात है!
हम आप सभी, मैं समझता हूँ जो आज ज़िम्मेवार नहीं हैं, ईमानदार नहीं हैं, वो भी शुभ की ही निरंतरता चाहता है। आज जो स्वयं ज़िम्मेवार नहीं है, वो भी चाहता है। जो ज़िम्मेवार, ईमानदार है, कहना ही क्या है, वो तो करेगा ही करेगा, नाच के करेगा, उछल के करेगा और सफल बनाकर करेगा। इस आधार पर हम सुखी रहता हूँ।
प्रश्न : बाबाजी एक प्रश्न है वित्तेषणा और लाभोन्माद के बीच में, क्या सीमा लिखा है, कहाँ पर वो अलग होते हैं?
उत्तर : देखिए, लाभोन्माद और वित्तेषणा से क्या मतलब है? वित्तेषणा का मतलब है - समृद्धि के अर्थ में वित्तेषणा है। समृद्धि जो है उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशीलता के अर्थ में सार्थक है. जहाँ तक की ये है लाभोन्माद, संग्रह सुविधा के अर्थ में है। संग्रह सुविधा भोग, बहुभोग, अतिभोग के अर्थ में है। सोच लीजिए आप ही, किस में व्यवस्था होगा, किस में अव्यवस्था होगा?
प्रश्न : आदमी को जागृत करने के लिए, सुखी समृद्धि बनाने के लिए हज़ारों बरस से शिक्षा की परम्परा रही है। आज जहाँ पर आकर मानव खड़ा हो गया है, आज भी उसके द्वारा सम्पूर्ण तृप्ति, सम्पूर्ण समृद्धि की स्थिति नहीं बन पाई। तो जीवन विद्या के प्रकाश में मध्यस्थ दर्शन में जो कुछ भी आपने प्रतिपादित किया है, उसके मुताबिक शिक्षा का स्वरूप और मनुष्य के संस्कार का क्या स्वरूप होना चाहिए?
उत्तर : अभी वो बात हो गई, मानव, देव मानव, दिव्य मानव शिक्षा मिलती है।शिक्षा क्रम में यह शिक्षा मिलती है, कम से कम मानव,न्यूनतम जागृति, मानवीयता को प्रमाणित करने योग्य बना देते हैं। तो उससे अमानवीयता से मानवीयता में संक्रमण हो जाता है। संक्रमण माने वापस राक्षस मानव पशु मानव बन नहीं पाएगा, उस जगह में आ जाता है। जैसा मैं, पशु मानव राक्षस मानव बन ही नहीं सकते, चाहे कुछ भी हो जाए, ये मानिए। तो ऐसे स्थिति में आदमी आ जाता है। आदमी आने के बाद करेगा क्या? आगे देव मानव ही बनेगा, दिव्य मानव ही बनेगा, उनका रास्ता ही उधर हो गया, इधर वाला रास्ता ही समाप्त हो गया। दोनों के उत्तर दक्षिण हो गया, उत्तर में चलने वाला दक्षिण की ओर घूम गया, या दक्षिण में चल रहा हैं वो उत्तर में घूम गया, ऐसा हो गया, पीठ दे दिया। ऐसा हो गया काम।
ऐसा होने का पहला जो लक्षण है, प्रमाण है, वो पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा में आता है। वो किसकी जगह में है? लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद के स्थान पर पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा में आता है। कितना बढ़िया? ठीक है? तो इस प्रकार से जब परिवर्तन होता है, ये पुनः वापस जो पीछे के स्वरूप के बारे में जाना, सम्भव ही नहीं रह जाता है। इसको हम संक्रमण कहते हैं। इस संक्रमण को ज्योतिषी में बहुत अच्छा प्रयोग किया है, उसी में ये संक्रमण की बात भी समझ में आता है। जो पीछे ना आवे, उसी का नाम है संक्रमण। ठीक है? ये बात कही गई है, तो सूर्य की गति में, चंद्रमा की गति में, धरती की गति में, उसकी गति में, इसकी गति में, सारे ग्रहों की गति में संक्रमण की