बात होता है मानवीयता पूर्ण आचरण, वो उसके साथ जिम्मेदार होने से, ईमानदार होने से और भागीदारी करने की क्रम आता है, वो भागीदारी करने की क्रम में मानवीयता पूर्ण आचरण प्रमाणित होता है, इन प्रमाणित होने के स्वरुप को हम कहते हैं संस्कार। ठीक है। शिष्टता पूर्ण विधि से प्रयोग भी होता है, समझदारी पूर्वक भी प्रयोग होता है, समझदारी और शिष्टता का योगफल में हम सामाजिक होते हैं। क्या बात है। समझदारी हो, शिष्टता हो तभी सामाजिकता प्रमाणित हो पाती है।
प्रश्न : बिना समझदारी शिष्टता हो सकती है क्या?
उत्तर : होते ही नहीं है, दिखावा होता है शिष्टता जैसा। ठीक है?
प्रश्न : समाधान शब्द को, और समाधान को जैसा आपने केंद्र बिन्दु बनाया है, समाधान को संपूर्ण चिंतन के मूल मे भी, उसको थोड़ा आप स्पष्ट कीजिए?
उत्तर : ये बहुत अच्छी बात है, ये थोड़ी सी ध्यान देकर अपने मन मे बैठाने की बात है, लक्ष्य और दिशा दोनों जहाँ मिलते हैं उस जगह का नाम है समाधान। लक्ष्य निश्चित हो और उसको दिशा निर्धारित हो वो दोनों का संयोग हो जाय, माने लक्ष्य के साथ दिशा छू जाय, दिशा सहित हम लक्ष्य को छू लें, लक्ष्य को सार्थक बना लें, इसका नाम है समाधान। ठीक है? इस ढंग से समाधान का परिभाषा बनता है। तो ऐसे समाधान सर्वतोमुखी समाधान, सर्वतोमुखी समाधान का मतलब है, मनुष्य के अनेक आयाम होते हैं, कोण होते हैं, दिशा होते हैं, और परिपेक्ष्य होते हैं, इन सभी विधाओं में, मनुष्य जो है ना समाधान को प्रमाणित करता है। लक्ष्य को, लक्ष्य के साथ दिशा को जोड़कर निश्चित प्रयोजन को सिद्ध करना है, इसी का नाम है, क्या नाम? समाधान। और दूसरा तात्विक परिभाषा में ये आता है, क्यों, कैसा का उत्तर हो जाये, ये समाधान। ठीक है? परिवार में व्यावहारिक परिभाषा बनता है, समाधान, समृद्धी से जीना, समाधान। समृद्धी पूर्वक जीना, समाधान। संबंधों को पहचानना, मूल्यों को निर्वाह करना, उभय तृप्ति पाना, ये समाधान। इस ढंग से व्यावहारिक परिभाषा बनती है। इन परिभाषा से जीने वाला आदमी ही होता है, दूसरा कोई होता नहीं, ठीक।
प्रश्न : मनुष्य जो है समाज मे हजारों हजार बरस से जीता रहा बहुत सारी उम्मीदों को ले कर। लेकिन समाज से जो उम्मीदें हम लोगों ने की थीं, वो आज तक पूरी नहीं हुई। तो वास्तव मे ये आदमी, आदमी के साथ जुड़ा हुआ समाज और जिसको हम सामाजिकता कहते हैं वो क्या चीज़ है? और आपके मध्यस्थ दर्शन के रोशनी मे उसका कौन सा स्वरूप बनाता है, जिसकी वजह से हम उस सच्चाई को समझ के, सामाजिकता को हम छु सकते हैं?
उत्तर : कौन सा ऐसा सच्चाई है कि सामाजिकता को छू सकते हैं, बात यही होता है। देखिए, तो उसके लिए एक ही बहुत छोटी सूत्र है, प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। इसको अपने को समझने की आवश्यकता है। परमाणु भी अपने त्व सहित व्यवस्था है, अणु भी है, अणु रचित रचना भी है, और जीव संसार भी है, और पशु संसार भी है, वनस्पति संसार भी है। सभी अपने-अपने त्व सहित व्यवस्था के रूप में ही होते हैं, और समग्र व्यवस्था में उनकी भागीदारी रहती है। धरती भी अपने में त्व सहित व्यवस्था है, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर ही रहा है। इसी प्रकार हर एक-एक को हम जितने भी छोटा-बड़ा सोच पाते हैं, वो सभी में ये गुण