ही बहुत अच्छी चीज़ है, इसको हम मान के रखे रहते हैं, उससे मुक्ति पाना जरूरत है। तो समाधानित हुए बिना, आदमी की स्वावलंबन को अनुभव करने के अर्हता नहीं हो पाती है, जबकि करते सारा, बहुत परिश्रम करते ही हैं, करने की उपरांत भी समृद्धि का अनुभव नहीं होता है, भ्रम वश। और वही, बस समझदार होने की पश्चात समाधान होता ही है, समाधान के आधार पर हम समृद्धि का अनुभव करते ही हैं, ये करने का अधिकार बनते ही हैं, साधारण बात है ये।
प्रश्न : इसको बाबाजी, ये जो जटिल सवाल है उसका एक पहलू और, कि समाधान के अनंतर तो एक बहुत बढ़िया समृद्धि का अनुभव भी होगा, स्थिति भी बनेगी, लेकिन अभी आदमी जहाँ पर खड़ा है दीनता-हीनता में, वहाँ से उसको समाधान तक पहुँचते तक यात्रा में स्वावलंबन का क्या..?
उत्तर : उसमें स्वावलंबन की अपेक्षा ही एक मात्र विधि रहती है, (अपेक्षा तो है) अपेक्षा रहना आवश्यक है, अपेक्षा होना और उसमें निष्ठा होना, निष्ठा होने की बाद क्रियान्वयन होना, ऐसा गति है इसका। तो तब तक जो है यही, जो कहीं ना कहीं समाधानित होने के लिए, हम जो समझदारी को बोना है, समझदारी को लोकव्यापीकरण करना है, उसको करना ही होगा, उसके पहले हम समृद्ध करा दें, बाद में समझदार होते रहें, ये सोचेंगे न, ये एक शेखचिल्ली होगी, ये ऐसा होने वाला नहीं है।
प्रश्न : इस बात को क्या आप किसी उदाहरण से स्पष्ट कर पाएंगे, कि जैसे आज भारत के बारह करोड़ से ज्यादा नौजवान लोग बेकार हैं, तो उनके लिए हम खेती को महत्व दें, या विज्ञान शिक्षा को महत्व दें, उद्योग तंत्र को हम उनके..?
उत्तर : पुनः अपन कहीं पहुँच गये, ये तो सब महत्व को देने वाले भाषण। देखिए, महत्व को देने वाले भाषण तो हर दिन होते ही हैं। उससे बात बनता नहीं है, उससे कुछ भी नहीं बनता, बनता है समझदारी से। समझदारी को अभी कोई शिक्षा दे नहीं पाया है। दीन-हीन बनाना, बेकार बनाना, शेखचिल्ली बनाना और कुछ भी नहीं है तो उसके पश्चात अपने आपमें मनमानी करने के लिए छोड़ देना, वो अन्ततोगत्वा छाती का पीपल होना, यही आज तक देखा गया है। तो शिक्षा में ना तो दिशा है, ना लक्ष्य है, उसके बाद आप कहते हो कि बेकार आदमी! बेकार बनाने के लिए ही पढ़ाया गया है, मने आदमी बेकार हो, अपराधी हो, संघर्ष हो, मरे, कटें, इसी के लिए तो पढ़ा करके छोड़ देते हैं, और क्या कहेंगे? ये इसी विधि से है ही है। ये बहुत साधारण है, ये होना ही है, समाधान शिक्षा अपने पास नहीं है। समाधान शिक्षा में स्वावलंबन समाहित है। और समझदारी के लिए सह अस्तित्ववादी शिक्षा की आवश्यकता है। सह अस्तित्ववादी शिक्षा में ये समाधान आता ही है, समृद्धि के लिए रस्ता, दिशा, कोण, सभी समीचीन हो जाता है। समझदारी के बिना आदमी स्वावलंबी होगा ही नहीं, कोई नहीं हुआ आज तक, आज तक तो हुआ नहीं।
प्रश्न : बाबाजी ये जो बोल रहे हैं आप, ये तो जब परंपरा हो जाएगी, समाधान की..
उत्तर: वो, तो परंपरा होने के लिए काम करो।
प्रश्न : उस स्थिति की बात बोल रहे हैं, आज वर्तमान में जिस परिस्थितियों में है?