उत्तर : जो परिस्थितियों में है, उसी परिस्थिति में आदमी समझदार होने का गेट खुला है।
प्रश्न : उसका क्रम बताइए ना थोड़ा।
उत्तर : क्या क्रम होता है। शिक्षा विधि से समझदार होना, और कौन सा क्रम। कहाँ बैठे हो, अभी तक।
प्रश्न : वो शिक्षा में launch नहीं हुआ है बाबाजी, अभी स्थापित नहीं होगी, जब स्थापित होगी उसके बाद।
उत्तर : रोना धोना कर ही रहे हैं, जैसा कर रहे हैं, वो ही करेंगे, चोरी चमारी, जान मारी, जो होना है, वो करेंगे। ये दुष्टता की शिक्षा, उसमे आप साधुता की परिकल्पना, ये कैसा होगा? ये शिक्षा में एक भी आदमी आज तक स्वावलंबी हुआ नहीं है। ये आप मानिए। तो स्वावलंबी होने के लिए शिक्षा ही नहीं है, आप जो है ना शिक्षित होने की बाद बेकार होना। वो ही आदमी है, नौकरी मिल गया तो चतुर हो गया, नौकरी नहीं हो गया तो दीन-हीन हो गया। जबकि पढ़ा दोनों आदमी एक ही है, ठीक है। इसका क्या मतलब भाई, इस शिक्षा का क्या मतलब, भाई आप ही बताओ। वो ही आदमी।
अब वो ही आदमी है, नौकरी मिल गया तो सभी जिम्मेदारी को सोंप दिया जाता है, नौकरी नहीं मिल था तो कोई जिम्मेदारी का अर्हता है ही नहीं, अब बागते रहो। ये आपके सामने दिखता ही है, फिर क्या है। इसमे तुरंत जो करने योग्य है, जो यदि किसी के पास मादा हो, आदमी को समझदार बनाया जाय। दरिद्रता से, दीनता से, हीनता से, दुष्टता से, छूटने की रस्ता समझदारी से निकलती है। दूसरा कोई विधि से आप सोचेंगे तो सब वृथा है, मगजमारी है, इसके अलावा कुछ नहीं होता है। अच्छा दूसरा विधि से कोई कुछ कर देना चाहते हैं, वही आदिकाल से आयी हुई, भूखे को दाना दे दिया, नंगे को एक कपड़ा दे दिया। ये तो कोई चीज़ बनता नहीं है, ये सब चीज़ें बेकार बात है। ये तो परंपरा ने वो सब कर-कुरा करके क्षत-विक्षत हो चुका है। इसलिए यदि स्थायी हल चाहिए, वो समझदारी परंपरा ही होगा, समझदारी के अनंतर ही समाधान होगा, समाधान ही है, वो रस्ता, वो स्वावलंबन होने की रस्ता। समाधानित बुद्धि के बिना काहे को स्वावलंबी होगा भाई आदमी, कैसा होगा?