उत्तर : हाँ वो कुल मिलकरके भाषा का मतलब है वस्तु बोध होना। जैसा ‘अस्तित्व’, ‘राम’ एक शब्द, ‘ईश्वर’ एक शब्द है, शब्द तो हम जानते ही हैं। मैं समझता हूँ, यहाँ जितने भी बैठें, यह सब जानते हैं। अस्तित्व बोध हो जाय, अस्तित्व वस्तु है, व्यापक वस्तु है, एक एक वस्तु का समुच्चय को हम अस्तित्व कह रहे हैं, वस्तु बोध हो जाय, इसका नाम है अध्ययन। पहले जो कहते हैं नाम का स्मरण, नाम को याद रखो। हम को पहले ‘शब्द’ को ही प्रमाण बताते रहे हैं, जबकि वस्तु प्रमाण है। हमारे शास्त्रों में लिखा है, शब्द प्रमाण, आप्तवाक्य प्रमाण। उसके बाद प्रत्यक्ष अनुमान, आगम प्रमाण, ऐसा लिखा हुआ है। तीन प्रमाणों की चरित्री, इतिहासी लिखा है, राम कथा लिखा है। हमारे यहाँ तो ऐसा ही लिखा है, और उसके बाद शास्त्र प्रमाण। क्या करोगे?
तो उसके बाद आया यंत्र प्रमाण, किस प्रमाण के साथ आदमी चले ? आदमी के लिए क्या प्रमाण है? मनुष्य के लिए, अनुभव किसमें होते है? तो मनुष्य मे होता है, और व्यवहार कौन करेगा? मनुष्य करेगा,प्रयोग कौन करेगा ? मनुष्य करेगा। तो क्या क्या प्रमाण हुआ? अनुभव प्रमाण, व्यवहारप्रमाण और प्रयोगप्रमाण ही मानव परंपरा का सम्मान जनक प्रमाण है। बाकी प्रमाण ठीक है, अपन भोगते आये हैं।ऐसी बनी हुई हैं महाराजजी, परिस्थितियां ऐसी बनी हैं, हमको बताया गया है, व्याकरण का भी ऐसे ही मंतव्य है, जो पद जो होता है, जो कुछ भी पद हमको समझ में आता है, वो शब्दों में होता है, जबकि वस्तु में पद होता है। अब उसके लिए क्या किया जाएं? हम ये सब कैसे हम मान लें? यदि उसी को मानते हैं, तो उसी को मानते रहें। उसी को मानने पर ये सब परिणाम हो चुकी है, कहीं न कहीं पहुँच चुके हैं हम। ठीक है ? उसका परिणाम में अभी बोला, करोड़ों करोड़ों आदमी बेरोजगार होकर के घूम रहे हैं।
सब किस आधार पर आ गया ? इतिहास के आधार पर ही तो आया है ये। इतिहास के अनुसार जो कुछ भी मान्यताएं हो उन मान्यताओं के आधार पर, यंत्र प्रमाण के आधार पर हो, शब्द प्रमाण के आधार पर हो, ठीक है न भाई, और स्मृति के आधार पर हो, श्रुति की आधार पर हो, विद्वता को प्रदान करने की बात हम कह ही रहे हैं। इसी इसी फॉर्मेट में कर ही रहे हैं। ठीक है न? श्रुति, स्मृति ये दोनों चीज़ शब्द प्रमाण के आधार पर ही है। और इस प्रकार से हम विद्वानों को बनाने के बाद सड़क में घूम ही रहे हैं। अब क्या करोगे ? इसीलिए समझदारी सम्पन्न परंपरा को स्थापित करने की जरुरत है। समझदारी जो आती है परंपरा में, अस्तित्व सहज विधि से ही आता है, नियति सहज विधि से आता है, विकास सहज विधि से आता है, जागृति सहज विधि से आता है। जागृतिपूर्वक प्रमाणित होता है, इतनी ही बात है। छोटी सी काम है, इसको सम्पन्न किया जाय।