असमर्थ है। इस आधार पर हम कहते हैं कि मनुष्य को यथार्थता को समझकर, मानवीयता पूर्ण यथार्थता के साथ जीने की पद्धति, प्रणाली, नीति, रीति सबको तैयार किया जाए। यहाँ से मानवीय इतिहास शुरू होगा।
अभी तक जो बीती हुई बात है, रहस्य पर आधारित कुछ इतिहास है, राक्षसीयता पर कुछ इतिहास है ये कुछ रहे ना, पाशवीयता पर तो इतिहास भरी हुई है, इन्हीं के continuation में जीना होगा तो कोई मना करने वाला तो आता ही नहीं। काहे को मना करेगा भाई? नहीं जीना होगा तो ये विधि, सहअस्तित्ववादी विधि।