मनुष्य इस धरती पर रहेगा, नहीं रहेगा? ये प्रश्न चिन्ह आ गई। इससे वो कुठिंत हो गए।ठीक है। ये कुल मिलाकरके विज्ञान संसार की गति, उसका फल, परिणाम, उसके आधार पर विज्ञान की स्थिति इस ढंग से समीक्षित हो पाता है।
इसके पहले अध्यात्मवाद में अंतर्मुखी बात आई थी। क्योंकि संसार को क्लेश रूप समझा, अंतर्मुखी होने से ही कहीं ना कहीं राहत है। अंतर्मुखी का अंतिम छोर समाधि बताया, उसके पहले ध्यान बताया, ध्यान में भी काफी राहत मिलती है, ऐसा बताया। उसमें काफी लोग अपने को जूझा, जूझने के बाद समाधि में भी कोई-कोई गया होगा, अंततोगत्वा समाधि के बाद भी, जैसा मैं समाधि को देखा, समझा, उस स्थिति में हम ना तो हम ज्ञानी हूँ, ये भी नहीं बता सकते थे, न ये भी नहीं बता सकते थे। हम अज्ञानी हूँ, बड़ा मुश्किल की कथा है। ये भी हम नहीं बता सकते थे कि हम सुखी हो गया हूँ, ये भी हम घोषणा नहीं कर सकते थे हम दुखी हो गया हूं। उस जगह में आए। तब हम को पता चला शस्त्रों मे लिखा हैं, समाधि का सुख "सुख, दुख से परे"। इसी को देख करके लिखा होगा ऐसा हमने सांत्वना लगाया।
तो जिस बात के लिए, समाधि के लिए हम प्रयत्न किया, वो मिला नहीं। मूल मुद्दा यही था, ये जो बंधन और मोक्ष की बात कहते हैं, पूरा वेदान्त को पढ़ने के बाद यही प्रश्न चिन्ह बनती है। ये "ब्रह्म ही बंधन का कारण है”। उसका छोटा सा स्वरूप यही है, आत्मा के रूप में ब्रह्म, जीवों के ह्रदय में बैठ गया, अब जीव जो है, भ्रम वश कर्म बंधन में आ गया। उसके बाद मोक्ष कैसा होता है, बोले, आत्मा परमात्मा में विलय हो जाता है, ये बताया। तो जब जीव के हृदय में आत्मा नहीं रहता, जीव जो है ना अपने आप से मुक्त था ही। काहे के लिए उसमे बैठ गया भाई? एक बुद्धु आदमी भी नहीं बैठेगा, इतने बड़े भारी ज्ञान क्यों बैठ गया उसके अंदर। इस प्रश्न का उत्तर कोई दिया नहीं, ना शस्त्रों में लिख पाए हैं। उसको हम स्वयं ही खोजने के लिए गए, अंततोगत्वा ये हुआ, हम बंधन और मोक्ष की बात समझने की कोशिश किए। उसमे हमारा सारा प्रयास के अंत में ये निकल गया।
भ्रम = बंधन
जागृति = बंधन मुक्ति
एक छोटी सी चीज़ के लिए, ये सब पहाड़ खोदना पड़ा, इसमें 25-30 वर्ष लगा। अंत में ये पता चला भ्रम = बंधन। भ्रम कहाँ से आता है? उसका उत्तर मिला, जीवन जब तक शरीर को जीवन माना रहता है, तब तक भ्रम। जागृति कब से है पूछे तो जीवन को जीवन माना जाए, शरीर को शरीर के रूप में पहचाना जाए, जीवन को जीवन के रूप में पहचाना जाए, जीवन के आवश्यकता को पहचाना जाए, शरीर के आवश्यकता को पहचाना जाए, इन दोनों को निर्वाह कर, व्यवहार कर प्रमाणित किया जाए।
इसके लिए क्या किया जाए? इसके लिए ये किया जाए, समझदार बना जाए। समझदारी का बात पूरा हो गयी, कि अस्तित्व को समझने से समझदार, जीवन को समझने से समझदार, मानवीयता पूर्ण आचरण को समझने से समझदार, उसको प्रमाणित करने से प्रमाण।इस ढंग से बात बनी । ये हमारा अनुभव की पूरा का पूरा झांकी ऐसा सजी।