आप को नहीं है, तुम स्वयं समाधि में जा करके दखो। ऐसा हमको बताया, यही आज भी बोलेंगे। अंतर्मुखी का जो वैभव है, कोई चीज़ सम्पदा होगा, वो मानव कुल के परंपरा में कहीं उतरा नहीं, यदि वैभव होगा। यदि वैभव नहीं होगा तो बात दुसरी है। इसको कहने के लिए हम तैयार नहीं हूँ कि अंतर्मुखी विधि से किसी को कोई वैभव का एहसास नहीं हुआ, ऐसा हम कहने को तैयार नहीं हैं, किन्तु जो कुछ भी अहसास हुआ होगा, वो मानव परंपरा को छूया नहीं है, प्रवाहित नहीं हुआ।
इस बात को हम गवाही दे सकते हैं। तो क्या परंपरा को अंतर्मुखी विधि से व्यक्ति केन्द्रित स्वरूप में छोड़करके क्या परिवार, समाज, सार्वभौम व्यवस्था ऐसी जगह की कल्पना में जा सकते हैं? यदि हाँ तो उसका प्रमाण प्रस्तुत होना चाहिए, यदि नहीं तो पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसा मेरी प्रार्थना की मतलब है। यदि पुनर्विचार करने की बात आती है, यही आता है हम प्रमाणित होना बहुत निहायत आवश्यक है। प्रमाण बिंदु जो है ना व्यवहार में ही है। व्यवहार परस्पर मानव के साथ ही है और नैसर्गिकता के साथ ही है। पर्यावरण के साथ है और मानव के साथ हमारा संबंध है। इसी सम्बन्धों में हम प्रमाणों को प्रस्तुत करना है, किस प्रमाणों को? समझदारी के प्रमाणों को। ये तो माना गया कि अंतर्मुखी आदमी समझदार है ही, ये अंतर्मुखी आदमी भले ही न माने किंतु लोग तो मानकर ही बैठे है। हम समझता हूँ बहुत प्राचीन काल से ये परम्परा रही है ऐसे मानना। उसका गवाही मैं ही हूँ, उसमें हमको कोई शंका नहीं है। सर्वोपरि समझदार आदमी यही है, हम लोग अंगुली न्यास कहते रहे, वो आदमी है तो व्यवहार को छूना।
हम आपको एक बार बताया, रमण महर्षि जैसा एक आदमी। हम उस समय में बचपन था, वहाँ के सारे बुजुर्ग, परिपक्व आदमी, सभी लोग कहते हैं ये ब्रह्मज्ञानी है। हम भी जा करके उनसे मिला हूँ। उसके बाद हम यही आशा रखे थे, जैसा हमारा रवैइया है, उस ढ़ंग से उनके साथ पेश आए नहीं हम, वो लोगों के सहमति जैसा था वैसा उनके साथ हम पेश आए। उसके बाद हम ये सोचते रहे इनसे कोई ना कोई चीज़ मानव के लिए संगत विधि निकलेगा। अंत में क्या किया “Who I am?” एक किताब लिखा,उनके मरने के बाद छपा वो। सन् 1952 में उनका शरीर शान्त हो गया। उसके बाद वो किताब छपा हुआ है, वो किताब को संयोग से हम अमरकंटक में देखा। वो पूरणां जी तीर्थ हमको लाकर दिखाएं। उसमे वेदांत, शास्त्र, दर्शन है उसी को वो समर्थन करते हैं। आप समर्थन दे के चले गये, उसका प्रयोजन बता नहीं पाए, तो क्या होगा? व्यवहार से छूता नहीं है, अछूता रहा। उससे ज्यादा आशा रखा हुआ आदमी हमारे मन में और कोई नहीं है। वास्तव में समाज को कुछ दे जाएगा, ऐसा हम जो छानबीन करके सोचे थे, एक ही आदमी वो भी नहीं दे पाया। अब उसके बाद क्या किया जाए? ये रिक्तता जो है, मानव परम्परा से दूर होने की आवश्यकता। इधर से कोई चीज़ मिलता नहीं है, इधर में गुणात्मक परिवर्तन कैसा होगा? जिस प्रकार की विन्यास से, कार्य से, मुद्रा से, भंगिमा से, स्थिति से, हम ये सोचते हैं इनसे सभी कुछ मिल सकता है, वहाँ से यदि कुछ भी नहीं मिलेगा, उसका दुसरा भाषा से बहिर्मुखी कार्य सब क्लेश और द्वेष की काम है और अंतर्मुखी क्लेश, द्वेष से मुक्त है, ये कुल मिला करके basic है। तो यदि क्लेश, द्वेष से मुक्त आदमी है, वो व्यवहार में यदि प्रमाणित नहीं हो पाता है तो क्या होगा? जब आदमी को देने के लिए कोई धन ही पैदा नहीं होगा, कब तक अंतर्मुखी को अगोरा जाए? ये तो मान लिया ये तो अपराध कारवाई करेंगे।
प्रश्न : अभी का अंतर्मुखी बहिर्मुखी दोनो अलग-अलग चीज़ है, प्रमाणित होने के क्रम में दोनों साथ-साथ बने रहते हैं। प्रिय, हित, लाभ में जीना मतलब बहिर्मुखी, ज्ञान, समझ के साथ प्रमाणित होना अंतर्मुखी।