उसके बाद ये अंतर्मुखी, बहिर्मुखी की बात आई। उसमें व्यवहार में जब तक हम अंतर्मुख में जो समझदारी को उपार्जन करते है, उसको व्यवहार में हम प्रमाणित नहीं करते हैं, हम समझदार होने का कहाँ प्रमाण है। तो अंतर्मुखी होने का प्रयोजन यदि समझदारी के अर्थ में हम प्रयोग कर सकेगें, वो लाभदायी होगी। ऐसा मेरा कहना है। इस विधि से अंतर्मुखी- बहिर्मुखी का प्रमाण, व्यवहार में ही मनुष्य प्रमाणित करेगा और कहीं प्रमाणित करने की जगह नहीं।ठीक है।
अभी आप देखेंगे चित्रकूट में आप चले जाइए, जहाँ कहीं भी बैठा रहता है साधू,पूछा - कैसा है बाबा “आनंद” कहता है, तो कुल मिलाकर के लोग आया हुआ मुट्ठी भर चावल के लिए बैठा रहता है दस पैसे के लिए बैठा रहता है, आनंद बताता रहता है ।ले भाई बाँटिये आनंद को। चित्रकूट में जाकर देखिए।