धातुओं का असंतुलन को आप ग्राफ में नहीं ला पायेंगे, चित्र में नहीं ला पाएंगे। आप हाथ से जो चित्र कर सकते हो वो सब यंत्र करेगा।
प्रश्न : नाड़ी का जो असंतुलन है, दाब, दबाव, रेडियोग्राफी में दिखता है, वो तो चित्रण है।
उत्तर :वो सब आता है, नाड़ी को हम थोड़े कह रहे हैं, कि साक्षात्कार है, नाड़ी का संकेत, जो चीज़ रसों में असंतुलन, धातुओं में असंतुलन इसका साक्षात्कार होता है, जो चित्र में नहीं आ पता है, और क्योंकि वो वस्तु नहीं है, माने उसका निराकरण के लिए आवश्यकता है, इसीलिए वो, बोध और स्वत्व के रूप में जाता नहीं।
प्रश्न : संतुलन का पहले बोध रहता है, नाड़ी में, बोध रहने के बाद ही उसके प्रकाश में हम रोग को पहचानते हैं। रोग को पहचानना साक्षात्कार माना जाएगा?
उत्तर : रोग में वो जो चित्रण में नहीं आता है, वो भाग का नाम है, साक्षात्कार। मनुष्य जो चित्र लिख नही पाएगा, वो सब साक्षात्कार में ही हम पहचानेंगे। साक्षात्कार में पहचानने के बाद उसका चिकित्सा देंगे।
प्रश्न : जानना, आत्मा में होता है?
उत्तर : जानने का जो प्रक्रिया होता है, बोध जानने का चिरस्थली है। जानने के पहले साक्षात्कार है, बोध हो गया माने हम जान लिया, हम उसके बाद मान लेते हैं, कैसा मान लेते हैं? हम प्रमाणित करने के लिए तत्पर होते हैं, तब मानते हैं। बोध से संकल्प में आते हैं। इसका तृप्ति अनुभव में ही होता है, क्योंकि अनुभव के रोशनी में ही बोध हुआ रहता है। अनुभव में जो हमारा बोध है वो फोटोग्राफी रहता ही है पहले से। हम उसको प्रमाणित करने पर वो तृप्ति मिल जाती है। प्रमाण और बोध की तृप्ति मिल जाती है।
बाबाजी आप जो बोलते हो अनुभव की रोशनी मे बोध होता है,अनुभव की रोशनी को तृप्ति की रोशनी भी कह सकते हैं ।
उत्तर : तृप्ति का बिन्दु हमारा बोध से बिल्कुल संगीतमय होना आवश्यक है। उसके बीच में कोई शब्द, कोई तर्क, कोई कारण, कोई गुण, कोई क्रिया, कोई तरंग, कोई भी चीज़ हिंडरेन्स नहीं है,इतना कॉमपेक्ट है।
प्रश्न: एक बार जो बोध हुआ। तृप्ति का अर्थ में बोध हुआ है, तृप्ति प्रमाणित करने से होता है। तृप्ति का अर्थ में बोध हुआ है उसको प्रमाणित करने के अर्थ मे फिर बोध हुआ।
उत्तर :प्रमाणित करने पर तृप्ति हुई।उस तृप्ति को हम अनुभव कह रहे है।
जो मनुष्य तृप्त होने की बातों पर, तृप्त होने की मुद्दे पर, बातें तो हम आदिकाल से मनुष्य तृप्त होने की सुनते ही रहे, चाहत के रूप में, तृप्त होने का एक मुद्दा आज तक बना ही रहा। इसमें ये पूरा सहअस्तित्ववादी चिंतन, मानव केन्द्रित विधि से आने के आधार पर, तृप्ति मुद्दा को समझदारी के रूप में पहचाना गया। इसको पहचानने के बाद प्रमाणित करके देखा गया। समझदारी के अनुसार आदमी प्रमाणित हो गए। में प्रमाणित हुए, माने आप भी हो सकते हो, ऐसा