Table of contents

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-1 इस संकलन के बारे 1 1. मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद 9 2. मानव केंद्रित चिंतन 12 3. जीवन की शक्ति व बल 26 4. अनुभव व जागृति 36 5. दर्शन, वाद और शास्त्र 40 6. मानव शरीर रचना 43 7. मानव शरीर गुण और नस्लें 46 8. जीवन और शरीर का सम्बंध 53 9. मध्यस्थ मार्ग और दर्शन 54 10. आहार विहार 57 11. ज्ञानवाही और क्रियावाही तंत्र 58 12. कामनाओं का विश्लेषण 65 13. अखण्ड समाज व्यवस्था 67 14. परमाणु – 1 78 15. परमाणु - 2 (आचरण) 82 16. परमाणु - 3 (मध्यस्थ बल व प्रजाति) 86 17. परमाणु - 4 (अंश और जीवन परमाणु) 95 18. परमाणु में गति 101 19. पर्यावरण संतुलन 104 20. विकास क्रम - पदार्थावस्था से ज्ञानावस्था 109 21. जागृति क्रम 113 22. शिक्षा संस्कार योजना 116 23. स्वावलम्बन 119 24. भाषा 122 25. गणित 127 26. उत्पादन कार्य योजना 129 27. विज्ञान 134 28. विवेक 137 29. समय, काल, वर्तमान 141 30. तकनीकी का प्रयोग 143 31. कला और तकनीकी 146 32. प्रबंधन 147 33. विनिमय कोष और श्रम मूल्य 150 34. न्याय, संविधान और संप्रभुता 152 35. स्वास्थ्य संयम 154 36. स्थिति, गति और बल 155 37. सापेक्षतावाद और अनिश्चयवाद 161 38. वनस्पतियों में जीवन और प्राण कोशा 164 39. समाधान और भय मुक्ति 167 40. कम्पन तरंग से ज्ञानोदय 173 41. विचारों का स्थान और प्रभाव 177 42. अनुभव - जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना 180 43. बोध साक्षात्कार 185 44. अंतर मुखी एवं बहिर्मुखी - 1 188 45. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 2 192 46. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 3 198 47. अध्ययन के तीन चरण 200 48. समापन

उत्तर : अंतर्मुखी में यदि साक्षात्कार हो जाता है, बोध हो जाता है, अनुभव हो जाता है, प्रमाणित हो जाता है, क्या चीज़? मोक्ष। उसको व्यवहार में प्रमाणित करिये। उसके लिए आवाज़ है कि व्यवहार से मोक्ष से कोई लेन-देन नहीं है। शास्त्रों के अनुसार ऐसा निकलता है। शास्त्रों में लिखा हुआ है “आत्माअर्थम् सकलम् त्येजते”। परिवार को त्याग दो, गांव को त्याग दो, देश को त्याग दो, ये सबको चलते-चलते “श्रेयाअर्थम् आत्माअर्थम् सकलम् दहते”, सब को त्याग दो कहे। प्रमाणित कर दो, ये कहीं भी शास्त्र में लिखा नहीं। वो क्यों? शास्त्र ही प्रमाण है। ये त्याग दिया, हो गया, खतम हो गया। ऐसा उसका आवाज़ होता है। अभी शास्त्र का आवाज़, घटना का गति, दोनों को मिलने से ऐसा आवाज़ बनता है।

प्रश्न : शास्त्रों का सार लेकर तुलसीदासजी ने रामायण को रखा। एक आदमी जो घर छोड़ता है, साधना करता है, ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है, उसके बाद अभिव्यक्त करता है, ऐसा उसका categorisation है।

उत्तर : ज्ञान व्यवहार में प्रमाणित होगा कि नहीं, पहली बात ये है। होगा तो वो कहाँ है? उसको पकड़ा जाए। अभी वो ही pulse है, और कोई नहीं। अपेक्षा तो यही है। वो अपेक्षा पूरा नहीं हुआ, अब क्या किया जाए? हमारा जैसा २५-३० वर्ष होते तक, अंतर्मुखी वालों से ना तो हम व्यवहार तक छूने का कोई चीज़ मिला, बहिर्मुखी होने वालों से अंतर्मुखी को छूने का कोई चीज़ मिला नहीं, अब क्या किया जाए? ये हमारा दम घुटने की कारण रहा।

ये हमारा बाप-दादा इतना ज़ोरदार तप करने के बाद भी, ये बहिर्मुखी की छोर तक ये पहुँच नहीं पाए, तो बहिर्मुखी छोर वाले, एक से एक दिग्गज, वो सब अंतर्मुखी तक पहुँच नहीं पाए, अब कहाँ जा करके मरे हम? जो वशिष्ट, विश्वामित्र, इन लोगों का अध्ययन करने लगे। अंततोगत्वा श्राप देने में, शब्द देने में या अनुग्रह करने में लग गए। कथाओं में ऐसा लिखा भी लिखा है। इन सब कारणों से हमको एक झंझावात परेशान किया, वाक़ई में यही बात है अंतर्मुखी से बहिर्मुखी से कहीं मिलना ही नहीं है, एक दूसरे ही दुनिया हो गया, एक दूसरे ही दुनिया हो गया, ये कब तक चलेगा? कब तक आदमी क़ुर्बान होता रहेगा प्रयोजन विहीन क्रिया में? बहिर्मुखी में कोई प्रयोजन नहीं निकलता, समाधान नहीं मिलता। अंतर्मुखी में कोई प्रयोजन नहीं निकलता, समाधान नहीं मिलता, अब क्या किया जाए? इसमें हमारा संकट घर आया। हमारा संकट घर आने से जो कुछ भी परिस्थितियाँ हमनें बनाई थी, वो सबको छोड़-छाड़ करके हम उसके ऊपर तुल गाए, जो कुछ भी होना था, हो गया।

अभी के स्थिति में, हमारे अनुसार, समझदारी को यदि अंतर्मुखी का उपज माना जाए, ये व्यवहार तक छू जाएगी। यहाँ हमारा प्रमाणिकता का समर्थन है।

(अभी तक जो हुआ, उससे अगला और उससे ज़्यादा शानदार कदम है।)

यदि सारा अंतर्मुखी प्रयास को, अभी तक जितने भी तप हों, जप हों, सब कियें, सबको समझदारी के capsule में हम देख पाएँ। समझदारी ही वास्तव में अंतर्मुखी वैभव का स्वरूप है। इसमें हम यदि आश्वस्त हो सकते हैं, वो समझदारी व्यवहार में प्रमाणित होती है।

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