उसके बाद आता है ’व्यवहारवादी समाजशास्त्र’। अभी हमारे पास जो समाज शास्त्र है, वो ’भोगोन्मादी समाजशास्त्र’ है। उसके स्थान पर हम ’व्यवहारवादी समाजशास्त्र’ लिखा, न्यायिक समाज। समाज शास्त्र का मतलब है - न्याय को प्रमाणित करना। उसमें बहुत लम्बी चौड़ी सिद्धांत कुछ भी नहीं है - संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उभयतृप्ति विधि से हम सामाजिक होते हैं। इसका प्रमाण में बहुत सारे models प्रस्तुत किए हैं, उसका अध्ययन से मनुष्य को काफी मदद होगी, आश्वस्त होगा, आगे की पीढ़ी भी अभ्युदय हो सकता है, ऐसा मेरा सोचना है।
तीसरे पक्ष ये रहा कि हमारा ‘मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान’। मनोविज्ञान में इस बात को दर्शाने की कोशिश किया है - मानव जो है ना संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता - इन दोनों के संयुक्त रूप में संचेतनावादी व्यक्ति होता है। संचेतना में क्या समाहित है? संवेदनशीलता और संज्ञानशीलता - ये दोनों एकत्रित है। संज्ञानशीलता में नियंत्रित संवेदनाओं को यदि हम प्रयोग करते हैं, किस प्रकार से हम व्यवहार कार्य करते हैं, कितने आयामों में करते हैं, कितने कोणों में करते हैं - उस बात को तर्क संगत विधि से, बोधगम्य विधि से, प्रस्तुत किया है।
इस ढंग से दर्शन, विचार और शास्त्र को प्रस्तुत करने की कोशिश किया, उसी के आधार पर तीन योजनाओं को प्रस्तुत कर दिया, वो है - जीवन विद्या योजना, उसके बाद शिक्षा का मानवीयकरण योजना और उसके पश्चात परिवार मूलक स्वराज योजना। इस ढंग से तीन योजनायें आयें हैं। इन योजना के बारे में बाद में अपन विचार करेंगे, यदि आवश्यकता हो तो। यही आप लोगों के हाथ में इन योजनाओं का स्वरुप प्रस्तुत है और इसके बावजूद भी आप लोगों को जिज्ञासा होगा तो उसपर हम विचार करेंगे।
जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!