वैध मानता है। उसके बाद सरकार क्या है, आप ही सोच लो। ये हर दिन के रोजमर्रे की बात है। ये भी नहीं कि एक ही दिन छपता है। हर दिन छपता है ये पेपरों में। इस प्रकार की चीज़ें हम देखते हैं। तो पता लगता है व्यापार के लिए शायद आदमी निछावर हो गया है। और व्यापार नहीं तो आदमी को चगुल-चगुल करके खा ले रहा है। दो में से एक हो गया है। तो उसको जाँचनें की बात है। व्यापार विधि से जो आवश्यकता होगा हम नहीं जानते। किन्तु इसकी अस्तित्व में, मानव परंपरा के लिए इस प्रकार की प्रयत्न की ज़रुरत नहीं है। इतना भर हमको समझ में आता है।
इसके बाद आता है - शरीर संरचना जब गर्भाशय में तैयार होता है, पाँच मास जब होता है, तब तक मेधस रचना पूरा हो जाता है। मेधस रचना के बाद ही कोई ना कोई जीवन शरीर को चलाने के लिए प्रयत्न करता है। इसका संकेत कैसे मिलता है? गर्भाशय में शिशु अपने आप में घूमने लग जाता है, हरकत शुरू करता है। इसको हर एक माँ बनने वाली महिला पहचानती है। वो ही बच्चे का सिरोभाग दाहिने तरफ यदि रहता है, अंत में वो लड़का के रूप में ही आता हुआ, बांय तरफ रहने पर लड़की के रूप में आता हुआ देखने को मिलता है। इसको सर्वाधिक देखा गया है, सर्वाधिक ऐसे ही प्रमाणित होता है। इस ढंग से इसको गर्भतंत्र में होने वाली प्रक्रिया - भ्रूण से शिशु, शिशु के बाद जो है ना जीवन और शरीर का संयोग, जीवन और शरीर के बाद शिशु का पूरा आकार, प्रकार, स्वरूप और उसके बाद शिशु काल में शिशु गर्भाशय से बाहर होने के उपरांत, वो कितना लंबा-चौड़ा, नस्ल, रंग होना है, उसका पूरा प्रमाणीकरण - ये कुल मिला करके शरीर तंत्र का मतलब बनता है।
शरीर रचना में जो कुछ भी तंत्र बने रहते हैं, वो मेधस तंत्र बने रहते हैं, मेधस तंत्र के आधार पर ही जीवन कार्य करता है, सारे संज्ञानशील प्रक्रियाओं को सम्पन्न करता है, ज्ञानवाही तंत्रो को तंत्रित करता है, संवेदनाएँ पूरा काम करते हैं, संज्ञानशीलता प्रमाणित करता है। इस ढंग से जीवन और शरीर का संयोग में ज्यादा से ज्यादा हमको प्रमाण मिलता है - संज्ञानशील कार्यकलापों में जीवन और शरीर का संयुक्त रूप होना प्रमाणित होता है। मुख्य बात यहाँ से है।
संज्ञानशीलता को पहचाने के बाद ये बहुत अच्छी ढंग से प्रमाणित हो जाता है। केवल संवेदनशीलता के विधि से इस बात को पहचानना बहुत कठिन है, क्योंकि वंशानुशंगी विधि से जीवों में भी संवेदनशीलताएँ व्यक्त हुई है। ये मनुष्य को भ्रम में डालता है। भ्रम में डालने के आधार पर जो घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ली में भी संवेदनाएँ होते हैं, तो मनुष्य में भी संवेदनाएँ होते हैं, ऐसा जोड़ लेते हैं। ऐसा जोड़ करके मनुष्य को जीव संज्ञा में हमको बताते आए हैं, जबकी जीव संज्ञा में मनुष्य नहीं होता है, ज्ञान संज्ञा में होता है। जब कभी हम ज्ञानावस्था की इकाई होने के कारण हम अपने कार्य-कलापों को संज्ञानशील विधि से संपन्न करना शुरू करते हैं, उसके तुरंत बाद ही जीवन और शरीर का संयुक्त कार्य-कलाप होने का जो प्रक्रिया है, वो अपने में प्रमाणित होना शुरू करता है। इसको अपन पूरा देखा जा सकता है।
प्रश्न : आपने शरीर रचना के संदर्भ में जो बात कही, गर्भ में लिंग का निर्धारण कब होता है? जीवावस्था का शिशु का शरीर रचना और मानव शरीर शिशु का शरीर रचना का गर्भ में क्या फर्क है?
उत्तर : अभी प्रश्न ये है - गर्भ में शिशु संरचना के पूर्व भाग में, माने आदि भाग में, भ्रूण नाम की एक अवस्था होता है। भ्रूण अवस्था तब तक हम मानते हैं, २७ दिन तक भ्रुणावस्था मानी गई। वो भ्रूण का पुष्टिकरण होने के पश्चात, भ्रूण और शिशु रचना की बीच की एक अवधि है, वो ५७ दिन तक बना रहता है। वो ५७ दिन के पहले, ५२ (52)