दिन के बाद, जो कुछ भी परिस्थितियाँ रहते है, उसमें लिंग निर्णय होने की अवधियाँ हैं। वो लिंग निर्णय यदि महिला शरीर बनना है, पुरुष शरीर बनना है, वो उन ४-५ दिन में निर्णय हो जाता है। एक बार वो अवधि पार हो जाता है, उसके बाद वो ही बना रहता है, पूरा का पूरा। उसी के आधार पर पाँच महीने के बाद, वो दाहिने तरफ, बाहिने तरफ सर रहने वाले बात है, उसका भी संकेत मिलता है। इस ढंग से जो हम लड़का पेट में है, या लड़की है, इस बात को साधारण रूप में ही पहचान सकते हैं। हर माँ बनने वाली महिलाएँ इसको पहचान सकते हैं। ये ऐसे बनी हुई है।
उस निर्णय के बाद, उस निर्णय को हम कैसे मानते हैं? इस ढंग से मानते हैं, उस अवधि में वांछित लिंग के लिए हम लोग दवाई प्रयोग करते हैं, ऐसा सर्वाधिक हम उपयोग करते हैं। इस आधार पर हम लोग इसको माने रहते हैं। ये कुल मिला करके मतलब है। इसके लिए और कोई बड़ी-भारी मशीन (machine) की ज़रुरत नहीं है, ना कोई बहुत बड़ी-भारी टेस्ट (test) की ज़रुरत है। ठीक है? ये बात ऐसा बना। ये तो हो गई एक मुद्दे की बात।इस ढंग से शिशु संरचना के पश्चात जो संपूर्ण वंशानुशंगी विधि से बच्चों को एक विकास होना चाहिए - बालिका मार्ग, युवावस्था, प्रोढ़ अवस्था इत्यादि अवस्थाएँ होना चाहिए, क्रम से होता हुआ आप हम को पता लगता ही है। ये तो हुई मनुष्य शरीर रचना और उसका पालन पोषण से होने वाली मनुष्य का आकार, प्रकार, नस्ल और रंग के साथ, वो हर जगह में, हर वंश में ये प्रमाणित होता ही रहता है, हर परंपरा में। है। ये हुई मनुष्य शरीर रचना के बारे में।