पहचानने की कार्यक्रम, पहचानने की विधि, लक्ष्य की स्थिरता के बारे में पूर्ण विश्वास करने की विधि को तर्क संगत विधि से जोड़ दिया। कौन तर्क है वो? विज्ञान सम्मत विवेक, विवेक सम्मत विज्ञान विधि से जोड़ा है। उसके बाद उसको जोड़ने के पश्चात एक सुगमता बन गई - हम व्यवस्था के प्रति विश्वस्त होने के आधार बन गई। व्यवस्था के प्रति यदि विश्वास होता है, ऐसा तो आप हम सब व्यवस्था को वरते ही हैं, अव्यवस्था को बिल्कुल नहीं वरते है, परिस्थिति पा करके अव्यवस्था में हाथ बटा देते हैं। ठीक है ये? इसमें क्या हो गई? मनुष्य का दोहरा व्यक्तित्व के लिए आसार बन गई। उस परेशानी को मिटाने के लिए हमने लिखा है ‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’। इसमें क्या होता है - दोहरा व्यक्तित्व की जरूरत नहीं है।
बिल्कुल आराम से, स्वच्छ रूप में, एक ही प्रकार से हमारा सोच समाधान से जुड़ी हुई, लक्ष्य से जुड़ी हुई। समाधान से जुड़ने पर व्यवहार में प्रमाणित हो जाते हैं, लक्ष्य से जुड़ने पर अनुभूत हो जाते हैं। क्या बात है, क्या बात है! लक्ष्य से जुड़कर हम तर्क को प्रायोजित कर देते हैं, अनुभूत हो जाते हैं। वो ही तर्क को हम समाधान से जोड़ते हैं व्यवहार में प्रमाणित हो जाते हैं। इसीलिए ‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’ व्यवहारिक है, इसको अध्ययन करने की आवश्यकता है, ऐसा हम शुरू किए। पहले जो थी ’रहस्यात्मक अध्यात्मवाद’ - अध्यात्म जो है ना व्यवहार में प्रमाणित नहीं होता है, वो वहाँ छोड़े थे। हम उसको आगे बताया - अध्यात्म यदि भी कोई वस्तु है, वो व्यवहार में ही प्रमाणित होगी। सबसे ज्यादा विश्वास दायक वस्तु व्यवहार में प्रमाणित होना ही है, इसको हम प्रतिपादित किया। ये शायद मानव कुल को मदद करेगा, ऐसा मेरा सोचना है।
उसके बाद क्या हो गई - ये तो हुआ वादों की बात। उसके बाद शास्त्रों के पास गए। शास्त्रों के पास में गए तो और भी उसमें कई जटिलताएं सुलझ गयीं। जैसा - अभी हमारे पास ’लाभोन्मादी अर्थशास्त्र’ हमारे प्रचलन में है, अभी शिक्षा संसार में प्रचलित है। उसका मूल सिद्धांत है - आवश्यकताएँ अनंत है, साधन सीमित है’। इसी लिए संघर्ष करना जरूरी है, मतलब लूट-पाट करना जरूरी है, यहाँ से अर्थशास्त्र को शुरू करते हैं। हम कहाँ से शुरू करते हैं? ’आवर्तनशील अर्थशास्त्र’। ’आवर्तनशील अर्थशास्त्र’ के मतलब में यह बतायी गई है, प्रतिपादन किया गया है - मनुष्य की जागृति के उपरान्त मनुष्य की आवश्यकताएं निश्चित होते हैं, संयत होते हैं, निर्धारित होते हैं, सीमित होते हैं, संभावनाएं अधिक हो जाते हैं। हमारा आवश्यकता पूरा होने की संभावना बढ़ जाता है। हमारा आवश्यकता कम हो जाता है, हम आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर सकते हैं, समृद्धि का अनुभव कर सकते हैं।
‘आवर्तनशील अर्थशास्त्र’ में इस बात का प्रतिपादन है। उसके साथ और एक बहुत अच्छी बात कही गई है - श्रम का नियोजन, श्रम का मूल्यांकन की बात कही गई है। श्रम मूल्यों के आधार पर वस्तुओं का आदान प्रदान विनिमय पद्धति के लिए, एक पद्धति को सूचना के रूप में, बोध के रूप में, अध्ययन के रूप में दिया है। वो यदि अध्ययन गम्य हो जाता है, आदमी को स्वीकार हो जाता है, ये चोरी-चमारी सब समाप्त हो गई, कुछ हो ही नहीं सकता। इसको यहाँ से रोका जा सकता है। अभी जो वर्तमान में व्यापार संसार में जो उत्पादन से लेकर व्यापार तक adultration बनी हुई है, ये दूर हो सकता है। अच्छे स्वच्छंद विधि से हम वस्तुओं को निर्मित कर सकते हैं, हस्तांतरित कर सकते हैं, हमारा आवश्यकता के वस्तुओं को सुलभ रूप में प्राप्त कर सकते हैं। उसकी विधियाँ लिखी हुई हैं। तो विनिमय पद्धति भी उसी के साथ लिखी हुई है।