अस्तित्व का भी दर्शक। ये बनता है, इसलिए दर्शन नाम दिया। दर्शन का मतलब है समझना, समझने की सारा प्रक्रिया मिल करके दर्शन है। उसको वाद में लाये तो तर्क संगत विधि से प्रस्तुत किया।
तर्क संगत विधि से प्रस्तुत करने की बात विज्ञान युग से शुरू हुई। उसके पहले तर्क को entertain नहीं करते थे। तर्क जो है ना उसको वितण्ड़ावाद कहते थे, नास्तिक कहते थे, इस प्रकार से कुछ कह लेते थे। किन्तु विज्ञान युग के बाद तर्क को स्वीकारना, सुनना शुरूआत हुआ। शुरूआत होकर वहाँ पहुँच गया - तर्क ही तर्क रह गया, वस्तु नहीं रह गया। कैसे दुष्परिणाम है, यह देख लीजिये। पहले तर्क को हम स्वागत ही नहीं किए, और उसके बाद जो बड़े लोग कहें- तुम कुछ पूछने का अधिकारी नहीं हो, ईश्वर के बारे में तुम कुछ पूछने का अधिकार नहीं है, यहाँ से तो हम lock किए थे सारा मार्ग को, किन्तु विज्ञान आ करके उसको खोल दिया। तर्क संगत विधि से हम प्रस्तुत होते हैं - ये पहले घोषणा किया। विज्ञान systematic study है, तर्क संगत है। दो बात इसमें है।
इस विधि से जो प्रस्तुत हुआ जन मानस को, तर्क पसंद आई। तर्क करने कि विधि में काफी लोग रंगें और काफी लोग तार्किक हुए भी, बहुत तर्क अभी भी प्रस्तुत करते ही हैं। इस ढंग से तर्क संगत करना भी एक कार्य आवश्यक है, ऐसा मैं सोचा। किस मुद्दे पर? अभी तर्क भौतिकवाद के अनुसार ’द्वन्दात्मक भौतिक वाद’ प्रस्तुत किए थे - उसको तर्क संगत विधि से प्रस्तुत किए - संघर्ष उसका केन्द्र बिंदु बनता है, स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सब को मिटा सकते हैं - ये अनुमति उससे मिलता है। उस आधार पर सब को मिटा दो, अपने को बनाए रखो - यही अनुमति मिलता है। तो उसमें कोई व्यतिरेक हो तो यहाँ बैठे हैं दिग्गज - आप लोग बतायेंगें। मेरे समझ के अनुसार इतने ही है। तो वो मानव उपयोगी नहीं हुआ - मानव के लिए तर्क संगत भी नहीं हुआ या वो व्यवहार संगत तो होना ही नहीं है।
तर्क सांगत ही जब नहीं होता है तब व्यवहार संगत कब होने वाला है। इसीलिए वो धीरे-धीरे सर्वाधिक लोगों के मन में अस्वीकृत भी हुआ है, ये भी बात हुआ है। करने जाते हैं, जीने जाते हैं, कहीं ना कहीं हस्तक्षेप के साथ ही जीना है, ये बात को भी स्वीकारा है। कोई ना कोई हस्तक्षेप के साथ ही हम जीयेंगें, ये भी बात स्वीकारा है आदमी, भौतिक शास्त्र के अनुसार। इसको लिखा उन्होंनें ’द्वन्दात्मक भौतिक वाद’, उसके आधार पर हमने लिखा ‘समाधानात्मक भौतिकवाद’। ये तो संघर्ष उनका शुरूआत थी, हमारे अनुसार शुरूआत होता है पूरकता से, सहअस्तित्व पूर्वकता, ठीक है ? पूरकता विधि से इसको - ‘समाधानात्मक भौतिकवाद’ को हम प्रस्तुत किया है। पूरकता विधि से विकास का क्रम, विकास - दोनों मानव को अध्ययनगम्य होता है, इसीलिए उसको लिखा। इस ढंग से ’समाधानात्मक भौतिकवाद’ का सार्थकता हमको समझ में आया।
उसके आगे ’व्यवहारात्मक जनवाद’। अभी जो हमारे पास है प्रचलन में, वो है ’संघर्षात्मक जनवाद’। वो ही - संघर्ष करो, तुम जीते रहो, बाकी को मिटाते रहो, बात यहाँ बोलते हैं। हम कहते है, सहअस्तित्व में सुख है, शांति है, संतोष है, समृद्धि है, वर्तमान में विश्वास है, सहअस्तित्व नित्य वर्तमान है। इसको मानव परम्परा के रूप में हम अच्छी तरह से अपने को सज सकते हैं, धज सकता हैं, प्रमाणित कर सकते हैं। ‘व्यवहारात्मक जनवाद’ में यह बताया।
उसके बाद ’अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’ लिखा। अध्यात्मवाद तर्क संगत से लिखा, तर्क का जो क्या कर दिया हमने - विवेक और विज्ञान - विवेक सम्मत विज्ञान, विज्ञान सम्मत विवेक। विवेक का मतलब है - हम लक्ष्य को