लक्षण दिख रहा है, बहुत सारे कट्टरपंती विधि से, या बर्बरता[1] के ढंग से या फिर अतिवाद, नक्सलवाद, वो वाद, आतंकवाद वगेरह बात मानते हैं, तो इसके अनुसार भी, परस्परता में शांति पूर्वक जीने की जो कुछ भी कामनाएँ है, उसको काफी धूमिल करता हुआ हम देखते हैं। इन सभी चीज़ें मनुष्य को याद रखने की बात है। तो दुष्टता में भी सभी नस्ल, रंग, जात वाले शामिल हैं; शांति पूर्वक जीने में भी सभी जात, रंग, नस्ल वाले शामिल हैं; शासन करने में भी सभी रंग, नस्ल, जात वाले शामिल हैं; शासित होने में भी सभी रंग, नस्ल वाले शामिल हैं; और धर्म को मानने में भी सभी अपना-अपना धर्म को मानते आ रहें हैं। अब क्या हुआ? कुल मिलाकरके आदमी को अलग-अलग करने का दो ध्रुव अभी प्रभावशील है - राज्य और धर्म। हम अलग राज्य के हैं, हम अलग धर्म के हैं - ये बात को अलग-अलग करता है। ये ही दो कांटा है, आदमी को चैन से रहने नहीं देना है। क्योंकि धर्म विधि से भी, हमारा धर्म के अलावा दूसरा कोई प्रकार के धर्म वाला रहावे ना करे, ऐसा भी सोचने वाले अच्छे लोग हैं। इस धरती पर सोचते हैं, अपने ढंग से कुछ काम भी करते हैं, स्वयं संकट में फंसे रहते हैं, दूसरों को संकटग्रस्त करने की कोशिश करते हैं, ये सब हम देखते ही हैं।
उसके बाद आता है, दूसरे विधियों में जाने के बाद ये आता है - राज्य विधि से - हमारे राज्य में यही जात रहे, दूसरे जात ना रहे - ऐसा भी सोचने वाले होते हैं। इस ढंग से संकट को घटित करने के लिए बहुत सारे प्रयास चले गए। इसके बावजूद सर्वाधिक आदमी शांति प्रिय हैं, और जो सुख शांति से जीना चाहता है, और समृद्धि से जीना चाहता है, समाधान से जीना चाहता है, ये बात survey करने पर, कहीं भी सर्वेक्षण करेगें मानव का, यही चीज़ें निकलती हैं। इसको हम कर सकते हैं, देख सकते हैं, निर्णय कर सकते हैं। ये बात ऐसी बनते है। तो अंत में कहाँ पहुँचे अपन? नस्ल रंग के आधार पर ना तो बर्बरता, हिंसा, डर, जान मारी, सेंध[2] मारी - इन सभी में कोई एक जात वालों को पहचाना नहीं गया, अनेक जात वालों को पहचाना गया।
दूसरा - राज गद्दी में बैठने के लिए इच्छुक एक जात वाला, एक रंग वाले की बात ना रह करके सभी रंग जात वाले गद्दी में बैठने की बात को भी पहचाना गया। उसी प्रकार पैसे के बारे में सभी रंग वाले, नस्ल वाले, जात वाले पैसे को प्राप्त किया हुआ देखा गया, और सभी गौरव संपन्न होने के लिए, जो बहुत सारे लोग पैर पड़ रहै हैं, ऐसे व्यक्तियों को सभी रंग वाले, नस्ल वाले, धर्म वाले, गद्दी वाले - सब को देख लिया गया, इस ढंग से सभी जात, धर्म वाले सभी कर्म कर सकते है, इसलिए हम मानव एक ही है, एक ही जात है। उसको हम इस विधि से भी अध्ययन कर सकते हैं। कुल मिला करके ये सब नज़ीरे आप हमारे सम्मुख आ चुका है, इसको अच्छे ढंग से हम ध्यान में लायें तो इससे पता लगता है, मानव जाति मूलतः एक ही है। रंग पर कोई जाति निर्णय नहीं होता है, रंग पर कोई reservation हो नहीं सकती और जाति पर नहीं हो सकती, नस्ल पर नहीं हो सकती, संप्रदाओं पर हो ही नहीं सकती, और केवल हो सकता है ये सभी आदमी जात एक।
आदमी जात एक है, ये बात को यदि हम पहचान पातें है, उसी के आधार पर आदमी का धर्म को भी पहचान सकते है। धर्म का मतलब? जो मानव धर्म के बारे में अभी याद दिलाये थे - ’सुख धर्म’। सुखी होने की आशय सब में