निहित है, सभी रंग वाले के पास, नस्ल वाले के पास, जात वाले के पास, सम्प्रदाय वाले के पास सुखी होने का आशय सब में समान है। इन सभी सुखी होने के विधि को हम पहचान सकते हैं, खोज सकते हैं और उसको लोकव्यापीकरण कर सकते हैं। उसी के आधार पर हम सभी सुखी होने की दिन का इंतजार कर सकते हैं। उसी क्रम में ये कार्यक्रम है। इसका मूल तत्व ही है - ’मानव जाति एक है, कर्म अनेक हैं’। पहला घोषणा यही है। मानव जाति एक होने का आधार पर हम मानव धर्म को पहचानते है। मानव धर्म सुख धर्म है, किसी जात-पात संप्रदाय का उसमें कोई रगड़ा-झगड़ा होते ही नहीं है, सभी आदमी सुखी होने के क्रम में हम समझदारी पूर्वक सुखी हो सकते है, इस बात को प्रयत्न किया। समझदारी के आधार पर सुखी होना सभी जात-पात वालों के लिए सुलभ है, उसी के आशय में समझदारी को परिपूर्ण करने के लिए शुरूआत किए।
तो मानव मूलतः एक जात की है। गर्भाशय में नस्लों के आधार पर शरीर आता है, क्योंकि जीवन जो है ना मनुष्य में प्रधान वस्तु है। जीवन सुखी होने के आशय में काम करता है। शरीर जो है ना रंग, नस्लों को ले करके घूमता रहता है। इस विधि से हर मनुष्य सुखी होने के आशय में सनी हुई है। इस आधार पर हम अच्छे दिनों को देखने की काम कर सकते हैं।
अब क्या होना चाहिए? शिक्षा में मानवीय शिक्षा को पहचानने की जरूरत, राज्य में मानव संविधान को पहचानने की आवश्यकता, आचरण में मानवीयता पूर्ण आचरण को पहचानने की आवश्यकता, परिवार में हम समाधान समृद्धि से कैसा जीया जाए, इसको पहचानने की आवश्यकता। इतने ही तो कुल मिला करके काम बनता है। इस पर चलने पर बहुत सारे हमारा समस्याएं हल हो सकते हैं।