उत्तर : सहज गति में संज्ञानशीलता में संवेदनशीलताएँ नियंत्रित रहते हैं। मानव का सहज गति यही है, माने प्रलोभन से मुक्त, या विरोध से मुक्त स्थिति में। हम संज्ञानशीलता पूर्वक जीने पर संवेदनाएँ नियंत्रित रहते हैं। इसी में मनुष्य स्वस्थ रहता है।
प्रश्न : मेधस से contact लिए क्या मन ज़िम्मेदार है ?
उत्तर : सारे बात के लिए जीवन जिम्मेदार है। जीवन मन के द्वारा मेधस को संचालित करता है, ऐसा वाक्य बनता है।
प्रश्न : ज्ञानवाही तंत्र क्या स्नायुतंत्र की तरह ही काम करता है?
उत्तर : हाँ हाँ,पक्का पक्का
प्रश्न : science से ये पता है कि स्नायु कैसे पूरे शरीर में जाल की तरह फैला हुआ है। ज्ञानवाही तंत्र का जाल किस तरह फैला हुआ है?
उत्तर : सभी जगह में होता है ज्ञानवाही तंत्र क्रियावाही तंत्र, एक तो ये समझ लो। जो क्रियाओं को संचालित करने के लिए तंत्रणा है, सोते समय भी होता है, बेहोश में भी होता है। उसके बाद जब कभी हम संवेदना और संज्ञानशीलता को प्रमाणित करते हैं, उस समय में ज्ञानवाही तंत्र काम किए रहते हैं। संवेदनाओं को जब कभी भी आपको प्रमाणित करना होता है, ज्ञानवाही तंत्र के द्वारा ही होता है। ये दोनों प्रकार की तंत्र जो पूरा शरीर में फैली हुई होती है। इसको ही हमारे medical science में sensory और motor कहते हैं।
प्रश्न : ज्ञानवाही तंत्र और क्रियाावाही तंत्र का सम्बन्ध कहाँ पर है?
उत्तर : मेधस में इसका सम्बंध हैl संयोजन, ज्ञानवहि और क्रियावहि तंत्र का संयोजन मेधस में ही है l
प्रश्न : क्रियावाही तंत्र को तो जीवन जीवंत रखता है और क्रियावाही तंत्र चलता रहता है ना बाबाजी, तो उसका तो मेधस से कोई वो नहीं होना चाहिए —--
उत्तर : बिना मेधस के चलना चाहिए क्या? ये रचना अपने में सम्पूर्ण है। इस सम्पूर्णता के अगंभूत एक-एक क्रियाएँ होती हैं। ज्ञानवाही तंत्र के द्वारा क्रियावाही तंत्र को आवेशित करना, इसका नाम है आवेश। जीवन पहले से आवेशित रहने से मेधस के द्वारा आवेश को प्रसारित कर देता है, फलस्वरूप ज्ञानवाही तंत्र क्रियाओं को आवेशित कर देता है, इसीलिए सम्बन्ध होना प्रमाणित होता है। हर आवेश में क्रियाओं को आवेशित करना है। किसके द्वारा? ज्ञानवाहि तंत्र के द्वारा, काहे के लिए ? किसी संवेदनाओं को विरोध करने के लिए, किसी संवेदनाओं को सम्पादित करने के लिए।
प्रश्न : प्राणवायु के सम्बन्ध में,मेढ़ास में भी प्राणवायु है तो जीवन प्राण वायु का मेधस पर परस्पर प्रभाव, प्राणवायु का रूप में क्या स्वरूप है?