उत्तर : हृदय का मतलब है, खून को सब जगह में पहुँचाना। पहुँचाने के बाद वो जितना भी गंदा होकर वापस आता है, वो फेफडे़ में शुद्ध होना, पुनः हृदय में पहुँचना। ये क्रियावाही कार्य है, इसमें मेधस को कुछ नहीं करना है, ज्ञान तंत्र को कुछ नहीं करना, जीवन्त रखना पर्याप्त है। जीवन्त रहने की क्रिया करता ही रहता है। इतने में ये संपादित हो जाता है। ज्ञान तंत्र से उसको कहो ‘खून बहाओ, खून बंद हो जाओ’ ये कहना नहीं है।
प्रश्न : आवेशित होने पर हृदय की गति कम ज्यादा होती है?
उत्तर :वो तो स्वाभाविक है, आवेशित होने की बात दूसरी हो गई। आवेशित होने के लिए हम को कोई ना कोई ज्ञानवाही तंत्र को बहुत ज्यादा उत्तेजित करना होता है। वो जीवन करता है, क्योंकि जीवन शक्ति अक्षय है, वो अपना गति से जहाँ कहीं भी तन्त्रित किया, अपने से भड़भड़ाना स्वाभाविक है। भड़भड़ाया तो साँस लम्बी हो गई, गर्म हो गई और फिर बेहोश होने लग गए, चक्कर आने लगी। ये सब तो होता ही है, उससे ज्यादा हो गया तो blood pressure बढ़ गई, उससे ज्यादा हो गया तो हृदय अवरोध हो गई। खतम हो गई बात।
अधिक गुस्सा होना, आवेश ही तो हुआ। आवेश होने से आवेश के आधार पर जितने भी ज्ञानवाही तंत्र तन्त्रित होता है, उसके फलस्वरूप में हृदय गति, फेफड़े की गति सब बढ़ जाति है। बढ़ जाने पर वो किसी अवधि से अधिक होने पर मर जाता है। शरीर तो जीवन के गति के अनुसार चल नहीं सकती है। मनोगति से शरीर चलेगा नहीं, आवेशित गति को सहने की, माने जीवन्त रहने की, कुछ अवधि होती है। उतने तक आवेश को सहता रहता है, उससे ज्यादा होने से स्वाभाविक है, कोई ना कोई failure होता ही है।
प्रश्न : जीवन का जो आवेश है, वो मेधस के माध्यम से ही तो transfer होता होगा?
उत्तर : हाँ ऐसे ही होता है। वो मेधस तंत्र के द्वारा ज्ञानवाही तंत्र में जब तंत्रित हो पाता है, तभी ये हृदय तंत्र आवेशित होगी, फेफड़े तंत्र आवेशित होगी, दो तंत्र आवेशित होगी।
प्रश्न : ज्ञानवाही तंत्र किस तरह से कार्य करता है, इसका जाल कैसा है?
उत्तर : संवेदनाशीलताओं को व्यक्त करने के लिए। कोई ना कोई संवेदनाओं के विरोध में क्रोध आता है, पक्ष में आवेश आता है। ये दोनों अतिरिक्त होने की आवश्यकता है, पक्ष में या विरोध में, किसी ना किसी संवेदना की। आप अपने में देख लो। ये अपने आप में संवेदनाओं के यदि विरोध ना हो, या अति प्रलोभन ना हो, आवेशित हो जाए, ऐसा कोई चीज़ आप नहीं पाओेगे। अति विरोध, अति सम्मोहन - दो स्थिति में ही मनुष्य आवेशित होता है, इन आवेश के फलस्वरूप हृदय तंत्र परेशान होता है और फेफड़ा तंत्र परेशान होता है, ज़्यादा से ज़्यादा।
प्रश्न: ज्ञानवाही तंत्र के माध्यम से ?
उत्तर : ज्ञानवाही तंत्र के द्वारा आवेश को show करेगा ही। क्रियावाही तंत्र के द्वारा रोग, रोगों को प्रस्तुत करता है। आवेश को प्रस्तुत करता है, ज्ञानवाही तंत्रों के द्वारा।
प्रश्न : सहज गति में कैसा होता है?