चाहिए। controlled effort में जीवन मिलना चाहिए। वो मिलेगा नहीं, controlled effort जो तैयार किया है, वो जीवन ही किया है। सबसे बड़ी भारी पंचायती यही है। सारा controlled effort को कौन बनाया ? जीवन ही बनाया है। जीवन अपने से छोटे चीज़ को ही बनाता है। छोटे चीज़ में बडे़ चीज़ समाता नहीं, छोटे सा काम। तर्क संगत विधि से यदि हम satisfy होना चाहते हैं, वो ये पूरा करता है। नहीं होना चाहते तो उसके लिए आरती रखी हुई है अपने पास। विज्ञान संसार जीवन को पहचान नहीं पाया - नम्बर एक। प्राणकोशाओं का क्रिया को वो जीवन समझता है। इसलिए उसी में मानव का सभी गुणों को व्याख्यायित करना चाहते हैं। ये बहुत समय से हो चुकी, 200 वर्ष बीत चुकी, अभी तक व्याख्यायित नहीं हुआ, ये करोड़ो वर्ष प्रयत्न करे प्राणकोशाओं में हम मानव का गुणों को व्याख्यित करेगें, ये होने वाला नहीं है। जीवन को समझने के बाद ही मानव गुणों को पहचाना जा सकता है। इसके पहले होगा नहीं। इस ढंग से हम कहीं ना कहीं गिर पड़े हैं। और इसको कैसा जोड़ोगे - ये RNA में आता नहीं है, DNA में आता नहीं है जीवन। अब क्या कर डालोगे, बताओ? इस ढंग से तर्क संगत विधि से इसका जवाब बनता है।
मेंने जीवन को देखा है, प्राणकोशाओं को भी देखा है। अणुओं को भी देखा है, परमाणु को भी देखा है, परमाणु में निहित अंशों को भी देखा है। उसके बाद क्या बचता है? इस सत्यता को हम स्वीकारते हैं। आगे कुछ अनुसंधान करने के लिए बनता है कार्यक्रम। उसमें ये बहुत जरूरी है जीवन परमाणु को पहचानना। जीवन होने का जो तरीका है और स्वरूप है, उसका कार्यप्रणाली है, लक्ष्य है, इन सभी चीज़ों को पहचानने की जरूरत है। उसके अलावा विज्ञान पूर्ति हो नहीं सकती, ना ज्ञान पूर्ति हो सकती।ज्ञान विधि में भी हम मनुष्य को पहचानने से चूक गए, वो भी केवल जीवन को पहचाना नहीं है। जीवन के स्थान पर और कुछ कल्पना देना चाहा वो प्रमाणित नहीं हुआ। अभी विज्ञान भी जीवन के बदले में DNA, RNA परिकल्पना देना चाहते हैं। ये होगा नहीं। वो आत्मा परमात्मा को देने गए वो हुआ नहीं।