अब धरती ही बीमार हो गया तो हम कहाँ तक इंतज़ार करें, क्या कर डालें! ये भी एक पुराण पंचांग निकलता है। ठीक हो गई? यदि ये झूठा है तो इसको माना न जाए। सच्चा है तो ये सोचने की मुद्दा है। ठीक है? आहार, विहार को हमको पहचानना ही होगा। उसके पहले हम व्यवस्था में जीना बनवे नहीं करेगा। आदमी व्यवस्था में तो जीएगा नहीं। आहार, विहार में ही विचलित हो गया। उसके बाद कौन सा व्यवस्था में जीएगा भाई? जीवों से भिन्न रूप में जीने के लिए, आहार विहार एक बहुत ही आवश्यक वस्तु है, यदि हम निश्चय करते हैं, निर्णय करते हैं, उसका पालन करना ही पड़ेगा ना? नहीं पालन करने से हो जाता है क्या, निर्णय करने मात्र से होता है क्या? पालन करने से निर्णय किया हुआ का गवाही मिलती है। बात सही है? यदि ये सच्चाई है तब हमको क्या करना चाहिए, ये सोचिये?
इस क्रम में हमारा जो सूझ-बूझ है, हमारा अनुभव है, मेरा स्वयं का अभ्यास है, वो यह कहता है - मनुष्य का शरीर रचना शाकाहारी शरीर के रूप में बनी हुई है number1, number 2- मनुष्य की अंतर रचना (शरीर में अंतर रचना होता है) और बाहर में जो है ना -नाखून है, दांत है -ये भी बना रहता है। मांसाहारी जीव जानवरों का दांत और नाखून अलग प्रकार से बनी रहती है और जो शाकाहारी जीव-जानवरों का नाखून और दांत अलग तरीके से बना रहता है। दो हुआ। तीसरा मुद्दा ये है - शाकाहारी जानवर होंठ से पानी पीते हैं, मांसाहारी जानवर जीभ से पानी पीते हैं।
इन तीन जगह की यदि अपन ध्यान दें, यदि इतना उदारता हो, ध्यान दें तो पता लगता है कि मनुष्य की शरीर रचना जो है, वो शाकाहारी जानवरों के सदृश्य है। ये पता लगता है। ठीक हो गई?
इस क्रम में ये निश्चय हम कर पाते हैं, तब हम आहार पद्धति को पहचान सकते हैं। आहार पद्धति को पाने के लिए विधि यही है, अभी तक परंपरा में ये बात तो मदद हो चुकी है, अनेक प्रकार के अनाजों को हम पैदा करने की हैसियत पैदा कर चुके हैं। विज्ञान आने के बाद क्या किया? वो हैसियत को हटा दिया। विज्ञान युग आने के पहले हमारा देश में कम से कम 7,000 प्रकार की धान थे। अभी 700 नहीं हैं, उससे कम हो गई। थोड़े दिन के बाद इनका laboratory में ही रह जाएगा धान और किसानों के पास एक भी बीजा नहीं रहेगा। उसका इंतजाम कर ही रहे हैं।
इस ढंग से विज्ञान मानव का उपकारी हुआ, मानव को बरबाद किया - सोचना पड़ेगा इस मुद्दे पर। माने ये नहीं है - विज्ञान से कोई मदद नहीं हुआ है, ऐसा मेरा कहना नहीं है। जहाँ तक दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी जितने भी कार्य साकार हुए हैं, यंत्र उपकरण, इसमें मानव जाति की गति के लिए बहुत उपकार हुआ है। मेरा मूल्यांकन ऐसा है। किन्तु बाकी दिशा में जो क्षति हुई, उसको भी अनदेखी नहीं किया जा सकता। उपकार हुआ है,उसका भी मूल्यांकन होना चाहिए। जो उपकार नहीं हुआ है, हानि हुआ है, उसका भी कहीं ना कहीं समीक्षा होना चाहिए। ऐसा मेरा request है। ठीक है। इन दोनों भाग को ले के चलने पर ये पता लगता है, विज्ञान से बहुत उपकार हुआ है। क्या उपकार? दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी बात, विज्ञान युग के बाद तर्क संगत जो वार्तालाप के लिए बहुत सारा खिड़कियाँ खोली। ये बहुत बड़ा भारी उपकार है। दोनों जगह में इसका उपकार हम को पहचानने में आया है।
इसके अलावा बहुत सारी जगह यदि होगा, वो विज्ञानियों से हम पहचानेंगे समय-समय पर। और उसके बाद जो बरबाद की पहचानी हुआ है, ये सच्चाई है। ये बरबादी तो हुआ ही है। क्या बरबादी हुआ? जो बीज विधि और बीज को उन्नत बीज बनाने की विधि से, मनुष्य का ज्यादा उपज पैदा करने के लिए, उन्नत बीज बनाने का जो प्रक्रिया