किया, उसका परम्परा हो नहीं सका। फलस्वरूप जो बनी हुई बीज परंपराएँ ध्वस्त हो गई, समाप्त हो गई, सब हज़म हो गई, अब किसान खाली बैठने के जगह में आ रहा है। इसमें दो ही मुद्दा है - किसान पुनः अपने जागृति को पैदा कर लें, अपने खेत में होने वाली धान, बीजा वगैरह कुछ भी, उसको अपने में संरक्षित करें। ये ही इसका उपाय सूझती है। इन उपायों को यदि नहीं अपनाते हैं, एक दिन जो है ना, अपने को, जो दुकानदार बैठें हैं एक laboratory बना करके, उनसे यदि बीजा नहीं मिला, आप दाना नहीं बोओगे। ये तो बात सच्चाई है। इस जगह में आने वाले हैं दिन। इस पर तो ध्यान देना चाहिए।
दूसरा - जो विज्ञान विधि से हम आहार निर्णय कर नहीं सके। क्या अड़चन हुआ? उसमें भी एक अड़चन पैदा किया। क्या अड़चन पैदा किया, पूछे?
अड़चन का स्वरुप ऐसा देखा गया - मांसाहार, शाकाहार का समानता को विज्ञान ने प्रतिपादित किया। उनकी विज्ञान विधि से मांस को परीक्षण करने पर भी पुष्टि तत्वों का पहचान होता है, इसमें दो राय नहीं है। क्योंकि शरीर में पुष्टि तत्व का उपयोग होता है, मांस के रूप में वो परिणत होता भी है, इसको हम अच्छी तरह से जानते ही हैं। वोही पुष्टि तत्व वनस्पतियों में भी मिलता है, ये भी बात सही है। जो वनस्पतियों को सेवन करते हैं, उनमें भी पुष्टि तत्व रहता है, जो मांसाहार करते हैं, उनके शरीर में भी पुष्टि तत्व हुआ करता है, इसमें तो समानता दिखाई पड़ती है। इसके मूल में जो मूल तत्व है, जीवन और जीवन मानसिकता - मानसिकता के ऊपर है ये। ये अभी आगे की जो कुछ भी हमारा मंतव्य[1] है, वो मानसिकता के अर्थ में है। मानसिकता शोषणवादी होना, हिंसावादी होना या नहीं होने के आधार पर है। सम्पूर्ण मांसाहार प्रक्रिया आदमी को शोषण और हिंसा की ओर ही प्रवृत्त करता है। हिंसा और शोषण मानव के लिए अत्यन्त हानिप्रद प्रवृत्तियाँ हैं। ये परिवार में भी हिंसा और शोषण हानिप्रद है, समाज में भी हानिप्रद है और व्यवस्था में भी हानिप्रद है, परस्पर देश के साथ भी हानिप्रद है,परस्पर समुदायों के परस्परता में भी हानिप्रद है। इस बात को अपन अच्छी साधारण मन से ही इसको पहचान सकते हैं।
इसके आधार पर, मांसाहार शाकाहार की पुष्टि तत्व के आधार पर समानता को बताकर एक सिर का दर्द पैदा किया। इसमें मानसिकता का पहचान ना होने का ही फल रही है। विज्ञान विचार से, जीवन शरीर से अलग-अलग कोई चीज़ है, ऐसा कोई सोचने की तरीका ना होने से, इस प्रकार की महानतम गलती कर बैठा। इतने ही बात है।
मंतव्य : मत, प्रस्ताव ↑