उत्तर : कामना ही हैं। ये जितने भी अनुष्ठान[1] करते हैं हमारा शुभ कामना है, अनुष्ठान करते हैं वो माने अशुभ कामना है। अनुष्ठान तो अशुभ के लिए भी किया जाता है, ये करते ही हैं। अच्छा, शुभ के लिए भी करते हैं - हमारा ये कामना है।
प्रश्न : उससे कुछ नहीं होता है?
उत्तर : कुछ नहीं होता है हम कहाँ कह रहे हैं? यदि घटित होने वाले जैसा हमारा कामना हो जाए, तो घटना होने पर हम सफल मानते हैं। बता तो दिया आपको।
प्रश्न : नियति क्रम में ऐसा घटित होना था इसलिए हो गया, कि हमारे इस कामना और..?
उत्तर : नियति क्रम में होने वाला था, उसी के अनुरूप में हमारा कामना जुड़ गया। इतनी ही बात है। वो हमारा कामना हमारे लिए तो सुख देता है। शुभ कामना हमारे लिए सुख देता है, अनिष्ट कामना हमारे लिए तो दुःख देता ही है। हर शुभ कामना हमारे लिए तो सुख का साधन है, हर अशुभ कामना हमारे लिए दुःख का साधन है। ये तो बात पक्का है।
प्रश्न : इस तरह की जो दुर्घटनाएं हैं, ये दिव्य मानव स्तर के लोग हैं वो इस तरह के दुर्घटनाओं में या इस तरह की जो विपत्तियाँ आने वाली हैं उसमें कोई वो नहीं कर पाते हैं हस्तक्षेप?
उत्तर : वो (देव मानव) कर ही रहे हैं - आदमी को समझदार बना रहे हैं, दुर्घटना से बचने ही है। हमारा कामनाएँ घटना के अनुरूप कभी-कभी होता है और प्रतिकूल भी होता है। ये मानिए आप। मनुष्य में, सामान्य मनुष्य में। ठीक हो गई, एक बात हो गई। अभी ये चीज़ आदि मानव से लेकर अभी तक हुआ। ठीक हो गई? अब जो आपने कहा - दिव्य मानव, देव मानव की बात, वो दिव्य मानव, देव मानव बनने के पश्चात तो कोई दुर्घटना की प्रश्न ही नहीं है।
प्रश्न : उनके साथ नहीं घटता औरों के साथ तो घटता ही होगा, उसमें वो क्या कर पाते हैं?
उत्तर : उनको दिव्य मानव, देव मानव बनाने की काम - अभी कर क्या रहे हो? भाड़ झोंक रहे हैं क्या?
प्रश्न : फलित कहाँ हुआ है भाई, हजारों साल के इतिहास में वो लोग क्या कोशिश किये हम को नहीं पता, लेकिन जितनी सारी दुर्घटनाओं को मानव जाति का जो सिलसिला है..
उत्तर : उससे (दुर्घटना से) ज्यादा सद् घटना हुआ है।
प्रश्न : नहीं सद् घटनाएं तो हुई हैं बाबा, दुर्घटनाओं को रोकने के क्रम में..
अनुष्ठान : कोई धार्मिक कृत्य; नियमपूर्वक आरम्भ करना ↑