इन मूल्यों को निर्वाह करने के क्रम में विश्वास सबसे पहला मूल्य है, विश्वास को निर्वाह करना एक आवश्यकता बन जाती है। परिवार के परस्परता में, परिवार में जितने लोग रहते हैं, उनके परस्परता में कोई ना कोई संबंध का संबोधन रहता ही है। चाहे भाई हो, बहन हो, माता हो, पिता हो, दादी हो, दादा हो - इस प्रकार के कोई ना कोई नाम से हमारा संबंध संबोधन रहता ही है। ऐसे संबोधन के साथ-साथ मूल्यों को निर्वाह करने वाली बात आती है।
बड़े बुजूर्गो के साथ सम्मान सहित विश्वास को निर्वाह करना होता है और साथियों के साथ विश्वास को निर्वाह करना होता है और अपने से छोटों के साथ भी विश्वास निर्वाह करना होता है। विश्वास निर्वाह करना प्राथमिक काम है, प्राथमिक मूल्य है। साम्य मूल्य केवल विश्वास ही है। इस आधार पर विश्वास को हम निर्वाह करना बन जाता है, बाकि मूल्य अपने आप से निर्वाह होना बनता है। इस क्रम को अपने को अपनाने की आवश्यकता है। ऐसा करने पर मनुष्य में एक बहुत बड़ी भारी ताकत जन्मती है - हम संबंधो को निर्वाह कर लिया, मूल्यों को निर्वाह कर लिया और मूल्यांकन किया, उभयतृप्ति पा लिया और साथ में इससे समाधान सिद्ध हो गई और इसके साथ समृद्धि को सिद्ध कर लिया। हम उपकार किए बिना रह ही नहीं सकते। हर व्यक्ति उपकार करने के योग्य हो जाता है।
उपकार करने के क्रम में ही हम समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए योग्य हो जाते हैं। ऐसे क्रम अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था के रूप में, समाज जो है मानव का अखण्ड समाज मानव जाति एक होने के आधार पर अखण्ड समाज की परिकल्पना आती है और अखण्ड समाज में सार्वभौम व्यवस्था ही एक मात्र व्यवस्था है। उसमें और कुछ व्यवस्था हो भी नहीं सकता। वो परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था ही होता है, जिसमें आराम से आदमी व्यवस्था को पा लेता है। उस व्यवस्था के अनुसार हमारा जो भागीदारी की मुद्दा आती है, तो न्याय सुरक्षा में भागीदारी करना बनता है। हम आसानी से कर लेते हैं और उत्पादन कार्य में भागीदारी करना होता है, उसको भी पूरा करते हैं। विनिमय कार्य में भागीदारी करते हैं, उसको भी हम पूरा करते हैं। स्वास्थ संयम कार्य में भागीदारी करते हैं, इसको भी हम पूरा करते हैं।
उसके बाद सबसे अच्छी बात, शिक्षा संस्कार कार्य में भागादारी करते हैं, इसको हम पूरा करने पर हमको अपना जो समझदारी का प्रमाण प्रमाणित होता हुआ दिखाई पड़ती हैं, परिलक्षित होता है, मूल्यांकित होता है। स्वयं का तो तृप्ति होती ही है, जिस समुदाय में, जिस बच्चों के बीच में हम प्रमाणित करने गया हूँ, उनमें भी उतने ही उत्सव और उत्साह जगता है, वे सब हमारे जीने के तरीका को देखकर उसमें बहुत आश्वस्त हो जाते हैं, विश्वस्त हो जाते हैं, अरमान को पैदा करते हैं, इससे इतने ही अच्छे ढंग से जीना चाहिए, इससे ज़्यादा अच्छे ढंग से जीना चाहिए, इस ढंग से एक प्रवृत्ति बनती है।
ऐसे उत्सव से मानव में प्रगति होना स्वाभाविक है और कहीं भी गलती अपराध करने वाली प्रवृत्तियाँ अपने आप से दूर होगी, अखण्ड समाज प्रवृत्ति में हम सर्वथा सभी का सभी सुखी होने की रस्ता बनती है। ये अखण्ड समाज के बारे में मूल मुद्दा आती है।
सार्वभौम व्यवस्था के बारे में मूल मुद्दा इतने ही है। इसको आसानी से हम पूरा कर सकते हैं, माने सुगम रूप में पूरा कर सकते हैं।