ये अपने आप से हक मिट जाती है। तो हम शांति चाहते ही हैं। शांति समाधान आप चाहते हैं, हम भी चाहते हैं, सभी चाहते हैं, इसी लिए शांति समाधान मिलने के लिए सम्पूर्ण मानव को एक जाति में पहचानने की आवश्यकता और उसी के आधार पर व्यक्तित्व को निर्धारित करने के बाद, व्यक्तित्व निर्धारित करने के लिए समझदारी की बात, समझदारी के आधार पर ही व्यक्तित्व निर्धारित होगा। समझदारी के आधार पर व्यक्तित्व जब निर्धारित होगा, और हर परिवार में समाधान समृद्धि पूर्वक जीने वाली बात प्रमाणित होती है, व्यवस्था में अखण्ड समाज व्यवस्था में भागीदारी करना भी बन जाती है। ये भागीदारी के क्रम में ही हम सभी आयामों में अपने वर्चस्व को हम प्रायोजित, नियोजित करते हैं, जो मनुष्य परम्परा के लिए ज़रूरत है। वो है पाँचों आयाम बताया, स्वास्थ्य संयम, शिक्षा संस्कार, न्याय सुरक्षा, उत्पादन कार्य, विनिमय कोष। इन पाँचों में हम भागीदारी करने पर हमको भी संतुष्टि मिलती है और दूसरों को भी संतुष्टि मिलती है। इस ढंग की बात है।
प्रश्न : अंश वस्तु के रूप में क्या है? अंशों की प्रकृति क्या है?
उत्तर : अंशों का मतलब कुछ नहीं निकलता, परमाणु अंशों का पूछना चाहिए। परमाणु स्वयं में एक वस्तु होता है, वस्तु का मतलब है - वास्तविकता को प्रकाशित किया रहता है। वास्तविकता ये है, हर एक परमाणु व्यवस्था के रूप में है, श्रम, गति, परिणाम के रूप में व्यवस्था को अपने में सम्पूर्णता के साथ व्यक्त किए रहते हैं हर परमाणु। उसका अंश के बारे में आप पूछ रहे हैं।
तो अंश अपने में स्वतंत्र रूप में कहीं भी अस्तित्व में रहना बहुत मुश्किल है। वो कोई भी अकस्मात्[1], अवांतर[2] वश, परमाणु विघटित होकर अंश के रूप में अस्तित्व में कहीं होता होगा, तो होता होगा, अन्यथा मनुष्य ही उसका मूल कारण है, अंश के रूप में परिवर्तित करने के लिए, एक मात्र मनुष्य ही है। मनुष्य यदि परमाणु के साथ अत्याचार ना करें, परमाणु अंश, अंश के रूप में अस्तित्व में मिलना होते ही नहीं है, बहुत ही कठिन और बहुत अपवाद[3] रूप में कहीं एकाध अंश मिलता होगा तो मिलता होगा। इस ढंग से इसको समझना चाहिए।
परमाणु अंशों में क्या विशेषता है? तो परमाणु अंश में भी सत्ता पारगामी है, सत्ता पारगामी होने की कारण से परमाणु अंश भी स्वयं स्फूर्त है व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए। इस आधार पर एक परमाणु अंश, दूसरे परमाणु अंश को पहचानता है, ये दोनों मिल करके व्यवस्था को समीकरण कर देते हैं। व्यवस्था को समीकरण करने के क्रम में श्रम, गति, परिणाम ये तीन चीज़ क्रिया के रूप में व्याख्यायित होना देखा गया है।
प्रश्न : अंशों की स्थिति, गति, आचरण व अंशों का स्रोत क्या है?
उत्तर : अंशों का स्रोत कुछ नहीं होता है, परमाणु ही विघटित हो करके अंशों के रूप में होना पाया जाता है। अंशों का कोई स्रोत नहीं होता है, कि अंश बनता हो, कोई विज्ञानी बनाता हो, कोई बेवकूफ बनाता हो, पंडित बनाता हो, ऐसा कोई चीज़ नहीं है। परमाणु ही विघटित हो करके अंशों के रूप में कहीं हो सकता है, दूसरा कोई विधि इसकी है