बुद्धिमानी का ही संस्कार होता है। आज तक इतना ही है। जितना हम पहले समझदार थे, उसका हमारे इस शरीर यात्रा में उपकार करता ही है। इसी के प्रमाण में हम पहले मानव से आज तक जितने भी विकसित हो पाए हैं, जागृति क्रम में, वो हमारे सम्मुख रखा ही है, तालिका बनता है उसका।
प्रश्न : पिछले शरीर यात्राओं से समझदारी, संस्कार की जो पूंजी मैं ले के आया हूँ, ये एक स्थिति हो गई। घटनाओं का जो घटने का क्रम हैं, उसमें भी क्या हम पिछले शरीर यात्रा में जो जी कर आए हैं, उसका कोई link इसमें जुड़ता है, कि उससे कोई link नहीं है?
उत्तर : सारे दुर्घटना, घटना के रूप में शरीर गत जितने भी शरीर के साथ घटने वाली घटनाएँ हैं, ग्रह, नक्षत्रों का योग रहता ही है। मनुष्यों का प्रवृत्ति का पुट चाहिए, दोनों एकत्रित होने से घटनाएँ घट जाती हैं। शरीर के ऊपर घटने वाली बात। शरीर के साथ जीवन होता ही है। शरीर जब बेकार हो जाता है तो शरीर को जीवन छोड़ देता है। बात ये हो गई, एक खाता ये पूरा हो गया। अब रह गया जो कुछ भी पूर्व जनम से हम लाये रहते हैं - समझदारी - वो कोई दुर्घटना घटाने के आधार पर आता नहीं है। जो कुछ भी शरीर यात्रा जहाँ से शुरू करते हैं, वहीं से दुर्घटना घटाने का कार्यक्रम शोध कार्य शुरू हुआ रहता है। उसका ज्वलंत उदाहरण है विज्ञान। जितना भी दुर्घटना को घटाना है, विज्ञान विधि से सफल हुए हैं। अच्छा सद् घटनाएँ घटाने में क्या सफल हुए हैं? उसका भी सवेरे तालिका में बता दिया। आपको बताये थे की नहीं? दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन सम्बन्धी साधनों को निर्मित कर पाए, ये विज्ञान का देन है। धरती को रोगी बनाया, ये विज्ञान का देन है।